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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 87
यस्तु तत्कारयेन्मोहात्सजात्या स्थितया5 न्यया । यथा ब्राह्मणचाण्डालः पूर्वदृष्टस्तथैव सः ।।
जो पति सजातीय (समान जातिवाली) स्त्री के सन्निहित रहने पर मोहवश विजातीय (दूसरी जातिवाली) स्त्री द्वारा शरीर-सेवादि कार्य करवाता है, वह ब्राह्मण चाण्डाल (ब्राह्मणी स्त्री में शूद्र पति से उत्पन्न पुत्र के तुल्य) प्राचीन ऋषियों द्वारा देखा (माना) जाता है।
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