तीन (पिता, पितामह और प्रपितामह) का उदक (तर्पण, तिलाझलिदान) करना चाहिये और तीन का ही पिण्डदान (श्राद्ध) होता है; चौथा इनको देनेवाला होता है, इनके साथ पाँचवें किसी का कोई सम्बन्ध नहीं होता।
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