इन नपुंसक, पतित आदि (९।२०१) को किसी प्रकार विवाह करने की इच्छा हो तो (इनके विवाह होने पर) उत्पन्न (नपुंसक की क्षेत्रज तथा पतितादि की औरस) सन्तान उनके धन पाने की अधिकारिणी होती है।
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