ब्राह्मणादि (गुरु या पति आदि) विधवा (९।६० का विमर्श देखे) को दूसरे (देवर या सपिण्ड पुरुष) में नियुक्त न करे अर्थात् सन्तान न होने पर भी सन्तानोत्पादन करने की देवर आदि को आज्ञा न दे, क्योंकि दूसरे (देवर या सपिण्ड पुरुष) में स्त्री को नियुक्त करते हुए (वे ब्राह्मणादि) सनातन धर्म को नष्ट करते हैं।
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