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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 54
ओघवाताहतं बीजं यस्य क्षेत्रे प्ररोहति । क्षेत्रिकस्यैव तद्बीजं न बीजी लभते फलम् ।।
पानी या हवा के वेग से (दूसरे के खेत में बोया गया) जो बीज बहकर या उड़कर दूसरे के खेत में जाता (अङ्कुरित होता) है, वह बीज (उस बीज का फल) खेत (जिसमें बीज जाता है, उस खेत) के स्वामी का ही होता है, बीज बोने वाला उसका कुछ भी फल (लाभ) नहीं पाता।
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