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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 216
ऊर्ध्व विभागाज्जातस्तु पित्र्यमेव हरेद्धनम्‌ । संसृष्टास्तेन वा ये स्युर्विभजेत स तैः सह ।।
पिता के जीवित रहते ही उन पुत्रों की इच्छा से उनमें धन का विभाजन (बँटवारा) होने पर यदि कोई पुत्र उत्पन्न हो तो वह पुत्र पिता के मरने पर उसके धन का भागी होता है तथा यदि कुछ भाई विभाजन होने पर भी पिता के साथ मिलकर रहने लगें तो बाद में उत्पन्न पुत्र पिता के मरने पर उसके साथ मिलकर रहने वाले भाइयों के साथ सभी धन में से समान भाग प्राप्त करता है।
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