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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 99
एतत्तु न परे चक्रुर्नापरे जातु साधवः । यदन्यस्य प्रतिज्ञाय पुनरन्यस्य दीयते ।।
महर्षि भृगुजी मुनियों से कहते हैं कि) कन्या को दूसरे के लिए देने का वचन देकर पुन: वह किसी दूसरे के लिए दे दी जाय, ऐसा न तो किसी पुराने सज्जन ने किया और न वर्तमान में ही कोई सज्जन करता है।
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