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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 47
सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते । सकृदाह ददामीति त्रीण्येतानि सतां सकृत् ।।
पिता पुत्रादि के हिस्से को एक बार ही बाँटता है (उसे बार-बार बदलता नहीं), कन्या एक ही बार (पिता आदि के द्वारा पति के लिए) दी जाती है (फिर उसे पति आदि कोई भी व्यक्ति द्रव्य लेकर या बिना द्रव्य लिए दूसरे को नहीं दे सकता अर्थात् विवाहकर्ता पति आदि कोई भी उस स्त्री को न तो बेच सकता है न त्यागकर दूसरे के लिए है, उसे ही दे ही सक्ता है) और 'गौ आदि को देता हूँ' ऐसा वचन एक ही बार कहा जाता है (दान की हुई गौ को बार-बार दान नहीं किया जा सकता)। सज्जनों के तीनों दान कार्य एक हो बार होते हैं, अनेक बार नहीं।
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