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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 103
एष स्त्रीपुंसयोरुक्तो धर्मो वो रतिसंहितः । आपद्यपत्यप्राप्तिश्च दायधर्मं निबोधत ।।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि) मैंने आप लोगों से रति (स्नेह-अनुराग) युक्त स्त्री-पुरुष के धर्म तथा उनके आपत्काल में सन्तान-प्राप्ति के विधान को कहा, (अब आप लोग) दायभाग (पिता आदि के धन के विभाजन-बँटवारा) को सुनें।
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