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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 233
तीरितं चानुशिष्टं च यत्र क्वचन यद्भवेत्‌ । कृतं तद्धर्मतो विद्यान्न तद्भूयो निवर्तयेत्‌ ।।
जिस किसी व्यवहार (मुकदमे) में जो शासन-व्यवस्था के अनुसार निर्णीत कर लिया गया हो और जो दण्डविधमान कर दिया गया हो; उसे धर्मपूर्वक किया हुआ जानना चाहिये और उसमें (निष्कारण) परिवर्तन नहीं करना चाहिये (तथा किसी कारण-विशेष के होने पर तो परिवर्तन भी करना ही चाहिये)।
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