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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 285
संक्रमध्वजयष्टीनां प्रतिमानां च भेदक: । प्रतिकुर्याच्च तत्सर्वं पञ्च दद्याच्छतानि च ।।
संक्रम (नाले या छोटी नहर आदि को पार करने के लिए रखे गये पत्थर या काष्ठ आदि) ध्वज (राजचिह्न या देवता को की ध्वजा), यष्टि (जाठ-तालाब, पोखरा, बावली आदि के बीच में गाडे गये लकड़ी आदि या पत्थर का खम्भा आदि), प्रतिमा (मिट्टी आदि की छोटी-छोटी पूजित मूर्तियाँ) इनको तोड़ने या किसी प्रकार नष्ट करनेवाले से राजा उन्हें ठीक करावे तथा उस व्यक्ति को पाँच सौ पणों (८।१३६) से दण्डित करे।
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