ज्येष्ठः कुलं वर्धयति विनाशयति वा पुनः ।
ज्येष्ठः पूज्यतमो लोके ज्येष्ठः सद्भिरगर्हितः ।।
धर्मात्मा ज्येष्ठ (भाई) ही कुल की उन्नति करता है अथवा अधर्मात्मा होकर कुल का) नाश करता है । गुणवान् ज्येष्ठ भाई संसार में पूज्य तथा सज्जनों से अनिन्दनीय होता है।
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