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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 245
ईशो दण्डस्य वरुणो राज्ञां दण्डधरो हि सः । ईशः सर्वस्य जगतो ब्राह्मणो वेदपारगः ।।
क्योंकि महापातकियों (९।२३५) के अर्थदण्ड को ग्रहण करनेवाला स्वामी वारुण है, अतएव वही राजाओं के भी अर्थदण्ड को ग्रहण करनेवाला है तथा वेदपारङ्गगत (एवं सदाचारी) ब्राह्मण सम्पूर्ण संसार का स्वामी है, (इस कारण उन महाफातकियो के धन को) वे ही दोनों (वरुण या वेदपारङ्ग सदाचारी ब्राह्मण ही) ग्रहण करने के अधिकारी हैं।
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