ये तत्र नोपसर्पेयुर्मूलप्रणिहिताश्च चे।
तान्प्रसह्य नृपो हन्यात्समित्रज्ञातिबान्धवान् ।।
जो चोर उन गुप्तचरों के उस प्रकार (पूर्व श्लोक में कथित भक्ष्य-भोज्यादि विषयक कपटयुक्त वचनों से) अपने पकड़े जाने की शङ्का से वहाँ (गुप्तचर के सङ्केतित स्थान में) नहीं आवे तथा उन गुप्तचरों से सावधान ही रहते हों; उन चोरों को राजा अपने गुप्तचरों से मालूम कर मित्र, ज्ञाति तथा बान्धवों के सहित उनपर आक्रमण कर उन्हें दण्डित करे।
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