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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 302
कलिः प्रसुप्तो भवति सजाग्रदद्वापरं युगम्‌ । कर्मस्वभ्युद्यतस्रेता विचरंस्तु कृतं युगम्‌ ।।
सोते हुए (अज्ञान तथा आलस्यादि के कारण उद्यमहीन) राजा के होने पर कलियुग, जागते हुए (जानते हुए भी उद्यम नहीं करने वाले) राजा के होने पर द्वापरयुग, कर्म (सन्धि-विग्रहादि राजकार्य) में लगे हुए राजा के होने पर त्रेतायुग और शास्त्रानुसार विचरण करने वाले राजा के होने पर सत्ययुग होता है।
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