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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 218
ऋणे धने च सर्वस्मिन्प्रविभक्ते यथाविधि । पश्चाद्‌ दृश्येत यत्किञ्चित्तत्सर्व समतां नयेत्‌ ।।
पिता के धन तथा ऋण का विधिपूर्वक विभाजन (बँटवारा) करने के बाद यदि पिता का कोई धन या उसके द्वारा लिया हुआ ऋण शेष रह गया हो तो उसको सब भाई बराबर-बराबर बाँट लें (उस धन में से ज्येष्ठ भाई को उद्धार अर्थात्‌ अतिरिक्त (९।११२-११५) नहीं मिलेगा।
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