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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 273
यश्चापि धर्मसमयात््रच्युतो धर्मजीवनः । दण्डेनैव तमप्योषेत्स्वकाद्धर्माद्धि विच्युतम्‌ ।।
धर्मजीवी (यज्ञ कराने से तथा दान लेकर दूसरों में यज्ञादि धर्मप्रवृत्ति उत्पन्न कर जीविका करनेवाला) ब्राह्मण यदि धर्म मर्यादा से भ्रष्ट हो जाय तो राजा उसे भी दण्ड द्वारा शासित करे।
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