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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 115
उद्धारो न दशस्वस्ति संपन्नानां स्वकर्मसु । यत्किञ्चिदेव देयं तु ज्यायसे मानवर्धनम्‌ ।।
सब छोटे भाइयों के अपने-अपने कर्मों में युक्त रहने पर पूर्वश्लोकोक्त दशदश गाय आदि पशुओं में से एक-एक गाय आदि पशु “उद्धार” रूप में ज्येष्ठ भाई को नहीं प्राप्तव्य होता; किन्तु ज्येष्ठ भाई के मान को बढ़ाने के लिए उसे कुछ भी अधिक भाग देना चाहिये।
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