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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 256
द्विविधांस्तस्करान्विद्यात्परद्रव्यापहारकान्‌ । प्रकाशांश्चाप्रकाशांश्च चारचक्षुर्महीपतिः ।।
(गुप्तचरों के द्वारा सब काम देखने से) चारचक्षुष्‌ (गुप्तचर ही हैं नेत्र जिसके ऐसा) राजा गुप्त (छिपकर) तथा प्रकाश (प्रकट) रूप में दूसरों के धन को चुराने वाले दो प्रकार के चोरों को मालूम करे।
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