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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 290
अभिचारेषु सर्वेषु कर्तव्यो द्विशतो दमः । मूलकर्मणि चानाप्तैः कृत्यासु विविधासु च ।।
सब प्रकार से अभिचार (शस्त्रोक्त-हवनादि करके तथा लौकिक चरण की धूलि लेकर या केश को भूमि में गाड़कर इत्यादि रूप मारणोपाय) कर्म जिसके लिए किया गया हो वह मनुष्य नहीं मरे तो उक्त कर्म करनेवाले पर दो सौ पण (८।१३६) दण्ड होता है (तथा यदि वह मनुष्य पर गया हो तो उक्त कर्म करनेवाले को प्राणदण्ड होता है) और माता-पिता-्स्त्री आदि को छोड़कर दूसरे झूठे लोगों द्वारा मोहितकर धन आदि लेने के लिए वशीकरण और उच्चाटन आदि कर्म करने वाले पर दो सौ पण (८।१३६) दण्ड होता है।
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