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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 110
यो ज्येष्ठो ज्येष्ठवृत्तिः स्यान्मातेव स पितेव सः । अज्येष्ठवृत्तिर्यस्तु स्यात्स सम्पूज्यस्तु बन्धुवत्‌ ।।
यदि ज्येष्ठ भाई (छोटे भाईयों के साथ) ज्येष्ठ के अर्थात्‌ पिता आदि के समान (लालन-पालन आदि उत्तम) वर्ताव करे तो वह (छोटे भाइयों के द्वारा) माता-पिता के समान पूज्य है तथा यदि (वह ज्येष्ठ भाई छोटे भाइयों के साथ) ज्येष्ठ के समान वर्ताव न करे तो उसके साथ (छोटे भाईयों को) बन्धु (मामा आदि बन्धुजन) के तुल्य व्यवहार करना चाहिये।
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