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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 214
सर्व एव विकर्मस्था नार्हन्ति भ्रातरो धनम्‌ । न चादत्वा कनिष्ठेभ्यो ज्येष्ठः कुर्वीत यौतकम्‌ ।।
(पतित नहीं होने पर भी) शास्त्रविरुद्ध (जुआ खेलना, मद्य पीना, वेश्यागमन करना आदि) करनेवाले सभी भाई पिता के धन के भागी (हकदार) नहीं होते हैं तथा ज्येष्ठ भाई छोटे भाइयों के भाग को बिना पृथक्‌ किये अपने लिए कुछ भी धन (पिता के धन में से) नहीं लेवे।
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