येऽ क्षेत्रिणो बीजवन्तः पर क्षेत्रप्रवापिणः ।
ते वै सस्यस्य जातस्य न लभन्ते फलं क्वचित् ।।
जो क्षेत्र (खेत) का स्वामी नहीं होकर भी दूसरे के क्षेत्र में बीज बोते हैं, वे उस (क्षेत्र) में उत्पन्न होने वाले अन्न के फल को कहीं (किसी देश आदि में) भी नहीं पाते हैं।
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