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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 163
एक एवौरसः पुत्रः पित्र्यस्य वसुनः प्रभुः । शेषाणामानृशंस्यार्थं प्रदद्यात्तु प्रजीवनम्‌ ।।
केवल औरस पुत्र ही पिता के धन का स्वामी होता है, शेष (क्षेत्रज पुत्र को छोड़कर बाकी दत्तक आदि) पुत्रों को दोषनिवृत्ति के लिए भोजन-वस्त्र आदि (खोरिश के रूप में) देना चाहिये।
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