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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 43
नश्यतीषुर्यथा विद्धः खे विद्धमनुविध्यतः । तथा नश्यति वै क्षिप्तं बीजं परपरिग्रहे ।।
जिस प्रकार किसी शिकारी या व्याध के द्वारा मारे गये मृग शरीर के उसी (पूर्व शिकारी से विद्ध) स्थान में दूसरे शिकारी या व्याध का बाण नष्ट हो जाता है अर्थात् उस मृग को पाने का अधिकार पहले शिकारी या व्याधा को ही होता है, दूसरे को नहीं उसी प्रकार परस्त्री में छोड़ा गया बीज (वीर्य) शीघ्र ही नष्ट हो जाता है; (क्योंकि उससे उत्पन सन्तान को पाने का अधिकार वीर्य निषेक करने वाले को नहीं होता, अपितु उस क्षेत्र (स्त्री) के पति को होता है, अतएव परस्त्री सम्भोग नहीं करना चाहिये।
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