धर्मेण च द्रव्यवृद्धावातिष्ठेद्यत्नमुत्तमम् ।
दद्याच्च सर्वभूतानामन्नमेव प्रयत्नतः ।।
वैश्य इस प्रकार (९।३२६-३३२) धर्म से (व्यापार, पशुपालन तथा खेती के द्वारा) धन बढ़ाने का उद्योग करता रहे तथा सब प्राणियों के लिए प्रयत्नपूर्वक अन्न का ही अधिक दान करता रहे।
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