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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 289
प्राकारस्य च भेत्तारं परिखाणां च पूरकम्‌ । द्वाराणां चैव भङ्कारं क्षिप्रमेव प्रवासयेत्‌ ।।
प्राकार (नगर या मकान का परकोटा अर्थात्‌ चहारदिवारी) को तोड्ने वाले परिखा (खाई) को मिट्टी आदि से भरने वाले और द्वार (राजद्वार या नगरद्वार) को तोड़ने वाले मनुष्य को (राजा) शीघ्र ही देश से बाहर निकाल दे।
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