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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 249
यावानवध्यस्य वधे तावान्वध्यस्य मोक्षणे । अधर्मो नृपतेर्दृष्टो धर्मस्तु विनियच्छतः ।।
अवध्य (नहीं मारने योग्य) को वध करने में जितना अधर्म होता है, उतना ही अधर्म (अपराध के कारण) वध करने योग्य व्यक्ति को छोड़ने में राजा को होता है और शाख्रानुसार दण्डित करने वाले राजा का धर्म देखा जाता है (अत: राजा दण्डनीय व्यक्ति को अवश्य दण्डित करे)।
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