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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 15
पौंश्चल्याच्चलचित्ताच्च नैस्नेह्याच्च स्वभावतः । रक्षिता यत्नतोऽपीह भर्तृष्वेता विकुर्वते ।।
व्यभिचारिता (सम्भोगादि की अतिशय इच्छा होने) से चित्त को चञ्चलता से और स्वभावत: स्नेह का अभाव होने से यत्नपूर्वक (पति आदि के द्वारा) सुरक्षित भी ये (स्त्रियाँ व्यभिचारादि दोष से) पतियों में विकृत (विपरीत प्रकृति वाली) हो जाती हैं।
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