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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 202
सर्वेषामपि तु न्याय्यं दातुं शक्तया मनीषिणा । ग्रासाच्छादनमत्यन्तं पतितो ह्यददद्भवेत्‌ ।।
सब (पूर्व श्लोकोक्त नपुंसक आदि) के धन को न्यायपूर्वक लेने वाला शास्त्रज्ञ विद्वान्‌ उन (नपुंसक-पतित आदि) के लिए भोजन-वस्त्र यथाशक्ति देवे और नहीं देने वाला पतित होता है।
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