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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 142
गोत्ररिक्ये जनयितुर्न हरेद्दत्रिम: क्वचित्‌ । गोत्ररिक्थानुगः पिण्डो व्यपैति ददतः स्वधा ।।
दत्तक पुत्र अपने पिता (जिससे उसका जन्म हुआ है) के गोत्र तथा धन कहीं भी नहीं प्राप्त करता है, इसलिए पुत्र को दूसरे के लिए देते हुए (उत्पन्न करने वाले) पिता के गोत्र तथा धन सम्बन्धी स्वधा (श्रद्धादि-कर्माधिकार) नष्ट हो जाते हैं।
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