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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 102
तथा नित्यं यतेयातां स्त्रीपुंसौ तु कृतक्रियौ । यथा नातिचरेतां तौ वियुक्तावितरेतरम्‌ ।।
(अतएव) विवाह किये हुए स्त्री-पुरुष को ऐसा यत्न करना चाहिये कि वे परस्पर में (धर्मार्थकाम-विषयक कार्यों में) कभी पृथक्‌ न हो।
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