(पूर्वोक्त ९।१४९-१६०) बारह प्रकार के पुत्रों में से उत्तम-उत्तम पुत्र के अभाव में हीन-हीन पुत्र (पिता के) धन का भागी होता है और सबके समान गुणी होने पर समान धन पाने के अधिकारी होते हैं।
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