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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 107
यस्मिन्नणं सन्नयति येन चानन्त्यमश्नुते । स एव धर्मजः पुत्रः कामजानितरान्विदुः ।।
पिता जिस पुत्र के उत्पन्न होने से पितृ-ऋण से छूट जाता है और अमृतत्व को प्राप्त करता है, वही (ज्येष्ठ-पुत्र) धर्म से उत्पन्न है, अन्य (शेष-छोटे पुत्र) कामवासना से उत्पन्न हैं, ऐसा (मुनि लोग) मानते हैं (अतएव वही ज्येष्ठ पुत्र पिता की सम्पूर्ण सम्पत्ति का अधिकारी होने के योग्य है)।
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