अध्याय 5 — पञ्चम पटल
शिव संहिता
255 श्लोक • केवल अनुवाद
यह अनाहतसंज्ञक चतुर्थ पद्म हत्प्रदेश में अवस्थित रहा करता है। इसकी बारह पंशुड़ियाँ पर क्रमशः 'क' से 'ठ' तक अर्थात् क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट और ठ के अक्षरों से अंकित रहता है। यह कमल परमोज्ज्वल और रक्तवर्णीय होता है। यह प्रसन्नस्थल वायु के बीज का अर्थात् प्राणवायु का आधार स्तम्भ होता है।
विशुद्ध नामधारी पंचम पद्म की अवस्थिति कंठप्रदेश में रहती है जिसका रंग सोने के समान सुनहला तथा सोलह स्वरों से युक्त पोडश पंखुड़ियों वाला कहा गया है। इसकी पंखुडियों पर 'अ' अक्षर से लेकर 'अः' तक के सोलह स्वर अर्थात् अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ल, लू, ए, ऐ, ओ, औ, अं तथा अः स्वर विभूषित रहते है। इस स्थान में छगलांड नामक सिद्ध तथा अधिष्ठातृ देवी शाकिनी सदैव निवसित रहते हैं।