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अध्याय 5 — पञ्चम पटल

शिव संहिता
255 श्लोक • केवल अनुवाद
देवी पार्वती ने शिवजी से कहा - हे ईश्वर, हे परमप्रिय शंकर! योगाभ्यास-काल में उपस्थित होने वाले विघ्नों को आप मुझसे कहिए, क्योंकि योगसाधना के समय साधक के समक्ष अनेक प्रकार की विघ्न-बाधाएँ आकर खड़ी हो जाती हैं। अतः आप अपने भक्तों के कल्याणार्थ उन विघ्नों के निवारण का उपाय कहिए।
शिवजी बोले - हे देवि! योगसाधना काल में साधक के सम्मुख जो-जो बाधाएँ आती हैं, उन्हें तुम एकाग्रतापूर्वक श्रवण करो। मनुष्यों के मोक्षमार्ग में भोग ही सबसे बड़ा बाधक होता है। इसके बन्धन में आबद्ध हो जाने के परिणामस्वरूप वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति में असफल सिद्ध हो जाता है।
स्त्री-प्रसंग, सुखद शैय्या पर शयन, उत्तम आसन, वस्त्र तथा धनादि वस्तुएँ मोक्षसाधन में बाधा-स्वरूप है। ताम्बूल-भक्षण, राज्यैश्वर्य-सम्बन्धी वाहनों का प्रयोग,
सोना, चाँदी, ताँबा तथा अगरु आदि सुगन्धित पदार्थों का सेवन और गोधन आदि का संग्रहण भर मोक्ष हेतु बाधक हैँ। वक्ता, वेद-वाक्यों पर तर्क-वितर्क, नर्तन, गायन, दैहिक साज-सज्जा,
बँसुरी, वीणा (तारयुक्त एक वाद्यविशेष), मृदंग आदि वाद्य-श्रवण, हाथी-घोडे आदि वाहनों पर आरोहण - ये सभी भोगरूपी बाधा कही गयी हैँ। अब इसके अनन्तर मैं धर्मरूप विध्न का कथन करता हूँ जिसे तुम श्रवण करो।
स्नान, पूजन, हवन, मोक्षमयी अर्थात् द्वन्द्वातीत स्थिति में रहना, व्रत, उपवास, नियमादि का पालन, मौनव्रत धारण, इन्द्रिय-निग्रहण,
अपने ध्येय का ध्यान, मन्त्रोच्चारण में संलग्नता, दानादि कर्म करना, चारों ओर अपनी कीर्ति-पताका फहराना, बावली, कूप, तालाब तथा भवन निर्माण की कल्पना,
यज्ञीय कर्मों का सम्पादन, पापक्षयार्थ कृच्छ्र चांद्रायण व्रत करना तथा अनेक तीर्थस्थानों में भ्रमणशील रहना - ये सभी कार्य धर्मरूप विघ्न की श्रेणी में आते है।
शिवजी देवी पार्वती के प्रति उन्मुख होकर कहते हैं कि वरानने, हे सुमुखि! अब मैं ज्ञानरूप विघ्न का निरूपण कर रहा हूँ। अन्तरात्मा की शुद्धि हेतु वस्त्र को गोमुख के समान रखते हुए धौति (षट्‌कर्मों के अन्तर्गत धौति, नेति आदि क्रियाओं में से एक) का प्रक्षालन करना,
नाड़ीचालन-क्रिया की शानोपलब्धि, वायु के प्रत्याहार का निरोध, कुंडलिनी शक्ति के उद्‌बोधनार्थ उदर का संचालन, इन्द्रिय द्वारा सद्यः प्रवेश, नाड़ी परिशोधनार्थ आहार के प्रति आचार-विचार का अनुपालन - ये सभी ज्ञानरूप विघ्न कहे जाते हैं। इसके आगे अब मैं नाड़ी परिशोधनार्थ उस आहार-विधि का वर्णन करता हूँ जिसे तुम सुनो।
योगाभ्यासी को नवीन रसपूरित पदार्थ शुंठी (सोंठ) चूर्ण के साथ आहार में ग्रहण करने चाहिए। भोजनोपरान्त सोंठ चूर्ण का सेवन करने के फलस्वरूप शीघ्र ही समाधि लग जाती है। अब मैं उसका लक्षण बतला रहा हूँ जिसे तुम ध्यान से सुनो।
इसके लिए सत्संगति, दुर्जनों से दूरीकरण, निर्गम में प्रवेश तथा कुम्भक प्राणायाम के समय गुरु और लघु संख्या का विचार करना आवश्यक होता है।
शरीरस्थ आत्मस्वरूप का विचार करते हुए इस बात का निश्चय करना कि रूपवान और कुरुपवान क्या है? यह सम्पूर्ण जगत ही ब्रह्ममय है - ऐसा विचार हृदयगम करना चाहिए। हे पार्वति! ये सभी लक्षण ज्ञानरूप विघ्न में पाये जाते हैं।
योग के चार भेद कहे गये हैं, जैसे - (१) मंत्रयोग, (२) हठयोग, (३) लययोग और (४) राजयोग। इन चारों में चौथा राजयोग द्वैधीभाव से रहित होता है। आशय यह है कि राजयोग के साधक में द्वैतभाव नहीं रह जाता जिसके परिणामस्वरूप वह ईश्वर के साथ एकीकृत हो जाता है।
उक्त चार प्रकार के योग सिद्धयर्थ चार प्रकार के साधक भी होते हैं, जैसे (१) मृदुसाधक, (२) मध्यम साधक, (३) अधिमात्र साधक तथा (४) अधिमात्रतम साधक। इन चतुर्विध साधकों में अधिमात्रतम साधक सर्वोत्तम माना जाता है, क्योंकि वह संसार-सागर पार करने में शीघ्र ही समर्थ बन जाता है।
चंचल चित्त, कायर, रुग्ण, अन्याश्रित, अत्यन्त निर्दय, मन्दाचारी तथा मन्द वीर्य (शक्ति) होता है। ऐसे पुरुष मृदुमानव कहलाते हैं।
इस प्रकार का साधक मन्त्र योग करने का अधिकारी होता है।
गुरु के अनुग्रह वश प्रयत्न पूर्वक साधना करने वाले ऐसे पुरुष की साधना बारह वर्षों में फलीभूत हुआ करती है।
जो साधक सामान्य बुद्धि, क्षमाशील, पुण्यकर्म करने का अभिलाषी, मृदुभाषी तथा समस्त विषयों या कार्यों में तटस्थ रहने वाला हो उसे मध्यम साधक कहा जाता है। इस प्रकार के लक्षणान्वित अभ्यासरत साधक को देखकर गुरु उसे लययोग की शिक्षा प्रदान करे, क्योंकि लययोग की साधना ही मुक्तिद्वार का एकमात्र साधन होता है।
ऐसा साधक जो स्थितप्रज्ञ, लययोग में तत्पर, स्वाधीन, पराक्रमशाली, उदारमना, दयालु, क्षमाशील, सत्यभाषी,
शूर-वीर, समाधि के प्रति श्रद्धावान, गुरुचरणानुरागी तथा योगाभ्यास-रत हो उसे ही अधिमात्रसाधक समझना चाहिए।
ऐसे साधक निरन्तर छह वर्षों के अभ्यास द्वारा सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। ऐसे धैर्यवान् साधक को गुरु हठयोग की सांगोपांग विधि से उपदेशित करे।
अधिमात्रतम साधक के लक्षण इस प्रकार से हैं, जैसे - महान पराक्रमी, उत्साही, शूर-वीर, शास्त्रज्ञ, अभ्यास-परायण, मोहविहीन, आकुलता से रहित अर्थात् सावधान चित्त,
नवयौवन सम्पन्न, मिताहारी अर्थात् संतुलित आहारग्राही, विजितेन्द्रिय, निर्भीक, शुद्धाचारी अर्थात् पवित्र आचरण याला, सभी कार्यों को करने में निपुण, दानशील अर्थात् निःसंकोच भाव से उदारतापूर्वक दान देने वाला, शरणागतजनों का प्रतिपालक,
स्थिर बुद्धि अर्थात् दृढनिश्चयी, बुद्धिशाली, सन्तोषी, क्षमाशीलता के गुण से समन्वित, सौम्य, धर्माचारी, धार्मिक कर्मों का गोपन करने वाला तथा सभी लोगों के प्रति प्रियभाषण करने वाला होता है।
इसके अतिरिक्त उक्त प्रकार का साधक शास्त्र-वचनों के प्रति निष्ठावान, देव तथा गुरुपूजक तथा जनसमाज से दूरी बनाये रखने वाला होता है। उसे किसी प्रकार की महाव्याधि (कुष्ठादि रोग) भी नहीं सताती।
इस प्रकार का योगाभ्यासी साधक ही अधिमात्रतम साधक कहा जाता है। ऐसे साधक को तीन वर्ष की साधना के पश्चात् सिद्धिप्राप्त होना सुनिश्चित रहता है। इस प्रकार के अभ्यासी समस्त योगसाधना हेतु उपयुक्त कहे जाते हैं।
अब यहाँ प्रतीक उपासना का उल्लेख किया जा रहा है। यह प्रतीक उपासना देखी-अनदेखी फल को देती है एवं उसके केवल दर्शनभात्र से ही आराधक निःसन्देहरूप से पवित्र हो जाता है।
जो साधक कड़ी धूप में अपलक नेत्रों से अपने ईश्वर के प्रतिविम्ब को देख ले और जब उस शून्य में अपनी प्रतिच्छाया भी उसे दिखायी देने लगे तब उस प्रतिविम्ब को गगन-मण्डल में अवलोकन करने में भी वह सक्षम हो जाता है।
जो साधक स्वप्रतीकरूप अपनी प्रतिच्छाया को नभमण्डल में देखता है उसमें आयुवर्धन होता है तथा उसके निकट कभी मृत्यु नहीं जाती।
यदि ऐसे अभ्यासी को अपना सम्पूर्ण प्रतिविम्ब आकाश-मण्डल में भासित होने लगे तो सभास्थल में उसे विजय-श्री मिलती है और वह युद्धभूमि में अपने शत्रुओं को पराजित करता है।
जो पुरुष सदैव ही प्रतीकोपासना के अभ्यास में निरत रहता है उसे आत्म-तत्त्व की उपलब्धि होती है। अर्थात् पूर्णानन्दस्वरूप आत्मा का उसे साक्षात्कार होता है।
आत्म-दर्शन के पश्चात् हृदयाकाश में परमज्योति का प्रकाश फैल जाता है। यात्राकाल में, वैवाहिक काल में, मांगलिक कार्य के समय, संकटापत्र स्थिति में अथवा पाप के क्षयार्थ और पुण्य के वर्धनार्थ प्रतीकोपासना निश्चय ही श्रेयस्कर होता है।
प्रतीकोपासना के निरन्तर अभ्यास के परिणामस्वरूप निश्चय ही अपने हृदय में स्वप्रतिविम्ब भासमान हो उठता है। ऐसी अवस्था में दृढ़ात्मा योगी मोक्ष का अधिकारी बन जाता है।
साधक को अपने हाथ के दोनों अँगूठों से दोनों कानों को, दोनों तर्जनी उंगलियों से दोनों नेत्रों को तथा दोनों मध्यमाओं से दोनों नासारन्ध्रों को बन्द कर लेना चाहिए। तत्पश्चात् दोनों अनामिकाओं के द्वारा दृढ़तापूर्वक मुखावरोध कर देना चाहिए।
जो साधक इस प्रकार वायु के अवरोधन का बारम्बार अभ्यास करता रहता है उसे अपने हृदयाकाश में निश्चय ही आत्मा के दर्शन होते हैं।
ऐसा योगभ्यासी पुरुष जो क्षणभर भी इस तेजपुंज के दर्शन कर लेता है वह समस्त पापों से विमुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।
जो पुरुष इस प्रकार की साधना में सतत अभ्यासशील रहकर चित्त की विशुद्धता बनाये रखता है वह सभी देहादि कर्मों से पृथक् होकर आत्मस्वरूप को प्राप्त हो जाता है। अर्थात् वह अपने को आत्मा से अलग नहीं समझता।
यदि इसका अभ्यास गुप्तरूप से पापकर्म में लिप्त रहने वाला प्राणी भी नित्य करता रहे तो वह भी मोक्षद्वार तक पहुँच जाता है। हे प्राणवल्लभे! यह प्रतीकोपासना अभ्यासी के लिए निर्वाण पद दिलाने वाली होती है।
अतः मुझे यह साधना अत्यन्त प्रिय है। इसकी साधना करने वाले पुरुष में क्रमानुसार नाद (शब्द-ध्वनि, वाद्य-ध्वनि, मेघ गर्जन आदि) की अनुभूति होने लग जाती है, किन्तु इसे सर्वदा गुप्त ही रखना चाहिए।
इस प्रकार से योगाभ्यास में निरत रहने पर प्रथमावस्था में साधक को मतवाले भौरों की गुनगुनाहट के समान शब्द सुनाई पड़ते हैं। पुनः बाँसुरी, बीणा आदि की झंकार-जैसे शब्द का बोध होने लगता है। तदनन्तर सांसारिक तिमिर को हटाने वाला घंटानाद जैसा शब्द श्रुतिगोचर होता है। इसके पश्चात् अन्त में मेघगर्जन-जैसी ध्वनि का अनुभव होने लगता है।
ऐसी अवस्था आने पर मन में पूर्ण रूप से स्थिरता आ जाती है और वही मोक्ष का कारण बनता है। अतः हे देवी पार्वति! ऐसी साधना मेरे लिए परम प्रियकारक है।
जिस समय योगी का चित स्थिरतापूर्वक नाद के अनुश्रवण में लग जाता है तब वह सभी बाह्य विषयों को भूलकर केवल नाद में ही विलीन हो जाता है। अर्थात् उसका चित्त किसी दूसरी ओर नहीं भटकता।
इस प्रकार के अभ्यास द्वारा योगी समस्त गुणों को विजित कर तथा सभी प्रकार के कार्यारम्भ को छोड़कर हृदयाकाश में विलीन हो जाता है।
सिद्धासन के समान अन्य कोई आसन नहीं होता। कुम्भक प्राणायाम के समान कोई दूसरा बल नहीं है, क्योंकि इसमें प्राणवायु को भीतर की ओर खींचकर उसे रोकने का अभ्यास किया जाता है जिससे बलोपलब्धि होती है। खेचरी मुद्रा के बराबर न कोई दूसरी मुद्रा होती है और न ही नाद के सदृश कोई दूसरा लयस्थान होता है।
शिवजी ने कहा - हे पार्वति! अब मैं तुमसे मोक्षानुभव का कथन कर रहा हूँ जिसके ज्ञानोपलब्धि से पापिष्ठ साधक भी मुक्तिलाभ प्राप्त कर लेता है।
प्रबुद्ध साधक को भली-भाँति ईश्वरार्चन करने के पश्चात् स्थिरचित्त से आसन पर बैठ गुरु की प्रसन्नता प्राप्त कर इस योग को ग्रहण करना आवश्यक है।
प्रज्ञावान योगसाधक का यह कर्तव्य है कि वह समस्त जीवादिक पदार्थों का परित्याग कर उसे योग-मर्मज्ञ गुरु को समर्पित कर दे और गुरु को भली-भाँति परितुष्ट कर उनसे योग की दीक्षा ले। योगग्राही, मनस्वी साधक का यह कर्तव्य है कि वह सर्वप्रथम वित्रों को दान-दक्षिणा से संतुष्ट कर उनसे मांगलिक अनुष्ठान सम्पन्न कराये।
तदनन्तर पवित्रतापूर्वक शिवमन्दिर में बैठकर आत्म-विषयक योग को ग्रहण करे । इस विधि से साधक गुरु के अनुग्रह को प्राप्त कर अपने पूर्व शरीर को त्याग दिव्यशरीर में आकर योगोपदेश ग्रहण करे।
अर्थात् योगग्रहणकाल में साधक का शरीर दिव्यकाय बन जाता है। उसकी समस्त व्याधियाँ तथा अज्ञानता दूर हो जाती है। अभिप्राय यह है कि योग ग्रहण के समय साधक को इस बात की चिन्तना करनी चाहिए कि अब मैं पूर्व शरीर को छोड़कर दिव्यशरीर में प्रविष्ट हो गया हूँ।
योगी को जनसमूह के सम्पर्क से रहित होकर किसी सुनसान स्थान में पद्मासन लगाकर बैठ जाना चाहिए। तत्पश्चात् उसे दोनों विज्ञान नाड़ियों अर्थात् इड़ा और पिंगला नाड़ियों का हाथ की अंगुलियों से प्राणवायु का अवरोधन करना चाहिए।
इस प्रक्रिया के द्वारा योगसिद्धाभिलाषी साधक के हृदयस्थल में सुखरूप निरंजन चैतन्य आत्म-प्रकाश का आभास होने लगेगा, किन्तु परिश्रम के फलस्वरूप ही योग की सिद्धि मिल सकती है।
जो साधक इस विधि का अभ्यास प्रतिदिन नियमित रूप से करता रहता है उसे सभी प्रकार की सिद्धियाँ हस्तगत हो जाती है और उसे क्रमशः वायु की सिद्धि भी अपने-आप हो जाया करती हैं।
जो योगसाधक इसे नित्य एक बार भी करता है उसके समस्त पातक क्षीण हो जाते हैं। तदनन्तर उसके प्राणवायु का प्रवेश सुषुम्ना नाड़ी में हो जाता है।
इस प्रकार का अभ्यासी साधक देवताओं द्वारा सेवित हुआ करता है। ऐसा साधक अष्ट सिद्धियों को प्राप्त कर त्रिलोक में भ्रमण करने की भी शक्ति पा लेता है।
जो साधक जिस किसी रीति से प्राणवायु को नियंत्रित करने का अभ्यास करता है उसे समस्त शारीरिक सिद्धियाँ उपलब्ध हो जाती है तथा वह बुद्धिमान साधक आत्मस्थ होकर सर्वदा ही क्रीड़ाशील रहा करता है।
इस प्रकार से यह योगसाधना अत्यन्त गोपनीय कही गयी है। इसे किसी अयोग्य या अनधिकारी व्यक्ति से नहीं कहना चाहिए। किन्तु जो शिष्य इस योगविद्या ग्रहण करने का उपयुक्त पात्र हो उसे इस विद्या को देने में गुरु को संकोच भी नहीं करना चाहिए।
जो पद्मासनस्थ योगी अपने मन को कंठकूप (कंठविवर) के स्मरण में लगाकर जिह्वा को तालुमूल में सटा देता है वह क्षुधा-पिपासा से रहित हो जाता है, क्योंकि कंठविवर के निचले भाग में कूर्मनाड़ी की अवस्थिति रहती है।
जो योगी अपने चित्त को उस कूर्मनाड़ी में समायोजित कर लेता है, उसके चित्त की चपलता मिट जाती है।
मानव के शिर और कपाल (खोपड़ी) में रुद्राक्ष-विवर की विद्यमानता रहती है। उस स्थान के चिन्तन से योगी में विद्युत्युंज के समान आत्मज्योति का प्रकाश उ‌द्भासित होता है।
उस आत्मज्योति की चिन्तना करने से योगी सभी पापों से विमुक्त हो जाता है। यदि ऐसा योगी विषयासक्त भी रहा हो तो भी वह मोक्षप्राप्ति का अधिकारी बन जाता है और उसे सद्गति मिलती है।
इस प्रकार से जो साधक दिन-रात आत्मतत्त्वबोध के चिंतन में निरत रहा करते हैं उन्हें सिद्धजनों के दर्शन और उनसे सम्भाषण करने का सुअवसर अवश्य ही प्राप्त होता है।
इस रीति से जो साधक उठते-बैठते, चलते-फिरते, सोते-जागते तथा भोजनादि सभी कालों में सतत आत्म-चिन्तना में लगे रहते हैं, वे आकाशस्वरूप होकर परमात्मा में विलीन हो जाते हैं।
इस ध्यान का निरन्तर अभ्यास करना सिद्धाभिलाषी पुरुषों के लिए आवश्यक होता है। हे पार्वति! इसका ध्यान सदैव करने वाला योगी मेरे समतुल्य हो जाता है। इस ज्ञान की प्रभावशालिता के कारण निश्चय ही वह साधक त्रैलोक्य का प्रियभाजन बन जाता है। अर्थात् उसका कोई भी प्राणी विद्रोही नहीं रह जाता।
यदि ऐसा योगी पद्मासन लगाकर नासिका की नोक पर अपनी दृष्टि जमा ले तो वह समस्त प्राणियों को विजित कर क्षुधा-तृषा से रहित हो जाता है। ऐसी अवस्था में चित्त की स्थिरता के परिणामस्वरूप उसमें खेचरता अर्थात् आकाश-गमन की क्षमता प्राप्त हो जाती है।
ऐसा योगीन्द्र विशुद्ध मन से उस शुद्धाचल के समान परमज्योतिपुंज के दर्शन पा लेता है। ऐसी दशा में योगसाधना के फलस्वरूप वह स्वयं ही उसका रक्षक बन जाता है। अर्थात् वह ज्योतिदर्शन के अभ्यास का सदैव ही अभिरक्षण किया करता है।
यदि बुद्धिमान साधक भूतल पर पीठ के बल सीधा लेटकर लगातार ध्यान में निमग्न रहता है तो उसकी थकावट शीघ्र ही मिट जाती है अर्थात् वह स्फूर्ति का अनुभव करने लगता है।
जो योगसाधक शिर के पिछले भाग का ध्यान करता है वह कालजयी बन जाता है। इस प्रकार के सभी फल प्रूमध्य में दृष्टि जमाने के फलस्वरूप होते हैं, इस बात को हम पहले ही बतला चुके है।
चतुर्विध अन्नाहार से तीन प्रकार के रसों की उत्पत्ति होती है। उनमें से पहला जो सारत्तत्त्व रूप रस है, उसके द्वारा लिंगशरीर की पुष्टि होती है।
दूसरे रस से सप्तधातुओं से संयुक्त पिण्ड का परिपोषण हुआ करता है तथा तीसरा रस सप्तधातुओं (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र) से पृथक् मल-मूत्रादि के रूप में होता है।
पूर्वकथित दो प्रकार के रस ही सम्पूर्ण नाड़ीरूप होते हैं। वे ही पैर से लेकर शिरोभाग तक शरीरस्थ वायु के पुष्टिकरण में निरत रहा करते हैं।
जब समस्त नाड़ियों में रस का संचरण होता है, तब उसके परिणामस्वरूप पूरे शरीर में अन्न द्वारा परिवर्तित रस प्रवृत्त हो उठता है। अर्थात् अन्न-रस के द्वारा ही शरीर का पुष्टिकरण सम्भव होता है।
समस्त नाड़ियों में जो प्रमुख रूप से चौदह नाड़ियाँ कही गयी है वे ही सम्पूर्ण देह-व्यापार को चलाती हैं। इन प्राण-संचारिणी नाड़ियों में सभी एक-दूसरे के समान होती हैं। अर्थात् कोई भी किसी से कम नहीं मानी जाती।
गुदाद्वार से दो अंगुल ऊपर की ओर तथा शिश्नमूल से एक अंगुल नीचे की ओर एक कंद चार अंगुल विस्तारवाला स्थित रहता है।
गुदा और जननेन्द्रिय के बीच में अवस्थित योनि पीछे की ओर मुख वाली होती है। उसी स्थान में वह कन्द वर्तमान रहता है और वही कुंडलिनी शक्ति का आवासीय स्थान भी होता है।
यह कुंडलिनी शक्ति सभी नाड़ियों को आच्छादित करके कुटिलाकार रूप में साढ़े तीन फेरे लगाकर तथा पूँछ को मुखस्थ करके सुषुम्ना नाड़ी के विवर में पड़ी रहती है।
यह सर्पाकर, कुंडलिनी शक्ति निद्रितावस्था में पड़ी रहती है। यह स्वयंप्रभा कहलाती है। अर्थात् अपने प्रकाश से ही प्रकाशमान रहकर सर्प के समान विवर में स्थित रहा करती है। यह वाग्देवी बीजसंज्ञक होती है।
इसके द्वारा ही वाणी की सिद्धि मिलती है। यही विश्व की बीजस्वरूपा भी है। यह कुंडलिनी ही नगदाधार विष्णु को परम शक्ति तथा तप्त कांचन के समान निर्मल तेजयुक्ता होती है। यह सत्त्व, रज और तम - इन तीन गुणों की उत्पन्नकर्शी होती है।
जिस स्थान में कुंडलिनी शक्ति अवस्थित होती है, उसी स्थान में बन्धूक पुष्प (गुलदुपहरिया) के सदृश रक्तवर्णीय आभायुक्त कामबीज की भी स्थिति होती है। वह आग में तपाये हुए स्वर्ण के समान चमकीला और प्रयुक्त अक्षर स्वरूप होता है।
कुंडलिनी शक्ति के आवासस्थल में ही कामबीज के सहित सुषुम्ना नाड़ी भी स्थित रहती है। वह कामबीज शरद् पूर्णिमा के चाँद के समान तेजोमय, करोड़ों सूर्य के समान प्रकाशवान तथा करोड़ों चन्द्रमा के समान सुशीतल रहता है।
कुंडलिनी, कामबीज और सुषुम्ना - इन तीनों का पारस्परिक मिलन होना ही देवी त्रिपुरभैरवी नामसंज्ञक कहलाता है। वह बीजसंज्ञक देवी परम तेजशील कही जाती है। वही बीज कभी क्रियाशक्ति और कभी ज्ञानशक्ति से समायोजित होकर देह में भ्रमणशील रहा करता है।
वह कभी तो ऊर्ध्वगामी होता, कभी जल में प्रविष्ट होता तथा कभी सूक्ष्म रूप में परिवर्तित हो जाता है। वह प्रज्वलित अग्निशिखा के समान अत्यन्त तेजोमय बिन्दुरूप से योनिस्थान में स्वयंभू लिंग की संज्ञा से समन्वित रहता है।
उक्त कथित प्रकार आधार पदासंज्ञक कहा जाता है। पद्म के मूलभाग में योनि की अवस्थिति होती है। यह परम दीप्तिमान पद्म अपने चार दलों (पंखुड़ियों) से विभूषित रहता है। उन पंखुडियों पर क्रमशः 'व' से 'स' तक अर्थात् व श ष स - वे चार वर्ण होते हैं। इस पद्मा को मूलाधार चक्र के नाम से जाना जाता है। वह पद्म कुलाभिध अर्थात् कुलसंज्ञक होता है। 'कुल' शब्द का एक अर्थ स्थान भी होता है। अतः इसका अर्थ कुंडलिनी के स्थान से भी लिया जाता है।
उसकी दीप्ति स्वर्ण सदृश होती है। वह स्वयंभू लिंग में समाहित है। उसमें द्विरण्डसंज्ञक सिद्धों का आवास माना जाता है तथा डाकिनी को उसका अधिष्ठात् देवता बतलाया गया है।
उस पद्म के मध्यवर्ती भाग के योनिस्थान में कुंडलिनीशक्ति की अवस्थिति रहती है जिसके ऊर्ध्वभाग में परम तेजवान कामबीज विचरणशील रहा करता है। इस मूलाधार कमल के ध्यान में निरत रहने वाले प्रवुद्ध साधक में दादुरी वृत्ति की सिद्धि आ जाती है।
अर्थात् जिस प्रकार मेढ़क भूमि से कुछ ऊपर की ओर उछलकर पुनः पृथिवी पर आ जाता हैं। उसी प्रकार इस साधना की प्रारम्भिक अवस्था में साधक भूमि से थोड़ा ऊपर उठकर फिर भूमि पर आ जाया करता है। इस प्रकार निरन्तर अभ्यास करते रहने पर अन्ततोगत्वा वह आकाश-गमन की शक्ति भी प्राप्त कर लेता है।
इस मूलाधार चक्र की ध्यानपरावणता से शारीरिक सौन्दर्य में निखार आ जाता है तथा क्षुधाग्नि भी प्रज्वलित हो उठती है। इसके द्वारा रोगोत्पत्ति की सम्भावना नहीं रह जाती और साधक में कार्यक्षमता तथा सर्वज्ञता की उत्पत्ति होती है।
उसमें समस्त पदार्थों का ज्ञान स्वयं ही आ जाता तथा वह त्रिकालदर्शी बन जाता है। जिन शास्त्रों के श्रवण करने का उसे कभी सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ होता उन्हें भी वह सांगोपांग रूप से जान लेता है।
ऐसे साधक के मुख-गहर में सदैव ही वाणी की अधिष्ठातृ देवी सरस्वती का वास रहा करता है अर्थात् उसे वाणी की सिद्धि उपलब्ध रहती है। उसे केवल मंत्रजाप से ही सिद्धि मिल जाया करती है।
गुरु-वाक्य के द्वारा वृद्धता, मरणशीलता, क्लेशता तथा समस्त रोगों का शमन होता है। प्राणवायु के धारक अभ्यासी साधक को इस परमोच्च ध्यान में सदा ही सत्रद्ध रहना आवश्यक होता है। इसके ध्यानमात्र से ही श्रेष्ठ योगियों के सभी पातकों का क्षय हो जाता है।
उक्त मूलाधार कमलवत् स्वयंभू लिंग का ध्यान जिस क्षण योगी करता है, उसी क्षण वह समस्त पापों से विमुक्त हो जाता है।
जो साधक इस मूलाधार पद्म का ध्यान धारण करते हुए जिन-जिन पदार्थों की अभिलाषा करता है उसे उन सभी इच्छित पदार्थों की उपलब्धि होती है। इसके अभ्यास में सर्वदा तत्पर रहने वाले योगी निश्चय ही मोक्ष-प्रदायक आत्म-दर्शन करने में सफल होते हैं।
हे पार्वति! वह आत्मा निश्चय ही बाह्याभ्यन्तर रूप से प्रयत्नपूर्वक पूजनीय होता है, ऐसा मेरा अभिमत है। इससे बढ़कर अन्य कोई भी योग नहीं है।
स्वदेहस्थ शिव-स्वरूप आत्मा का परित्याग कर बाह्य देवताओं का पूजन-अर्चन करना उसी प्रकार समझना चाहिए जिस प्रकार करस्थ पिण्ड को त्याग कर अन्य पिण्ड-प्राप्ति हेतु भ्रमण-शील रहना।
जो साधक नित्यप्रति आलस्यरहित होकर शरीरस्थ आत्मा की पूजा-अर्चना करता है उसे समस्त सिद्धियाँ अनायास ही मिल जाया करती हैं।
इस विषय में सोच-विचार की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। निरन्तर छह मास तक इसके अभ्यास के फलस्वरूप साधक में ऐसी सिद्धि आ जाती है कि उसका प्राणवायु सुषुम्ना नाड़ी में प्रविष्ट हो जाता है।
इसके परिणामस्वरूप वह पुरुष अपने चित्त को अधिकृत करके वायु और विन्दु (वीर्य) धारण में भी सक्षम बन जाता है। इसके अतिरिक्त उसे लौकिक सिद्धियाँ भी निःसंदेह रूप से उपलब्ध हो जाता है। आशय यह है कि आत्म-पूजक प्राणी अपने लौकिक एवं पारलौकिक-इन दोनों लोकों को सुधार लेता है। वह जब तक इस लोक में रहता है तब तक समस्त सुखों को भोगकर अन्य में निर्वाण पद को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार वह योगी 'एक तीर से दो निशाना' की कहावत भी चरितार्थ करता है।
दूसरा छह पंशुड़ियों वाला कमल शिश्नमूल में स्थित रहता है। इसकी प्रत्येक पंखुड़ियों पर क्रमशः 'ब' से 'ल' तक के वर्ण विभूषित रहते हैं। अर्थात् 'व भ म य र ल' - इन वर्णों से संयुक्त रहता है।
यह रक्तवर्णीय पद्म स्वाधिष्ठान के नाम से अभिहित होता है। इस स्थान में बाण नामक सिद्ध और राकिणी नाम्नी अधिष्ठातृ देवी विद्यमान रहती है। इस कमल के देवता ब्रह्मा कहे गये हैं।
जो पुरुष इस स्वाधिष्ठानसंज्ञक कमल का सदैव ध्यान किया करते हैं उनके रूप-लावण्य पर कामरूपिणी मुग्धा नारियाँ सदा ही उनकी अनुगामिनी बनी रहती हैं।
ऐसा साधक अश्रुत शास्त्रों की सर्वांगीण व्याख्या करने में भी सक्षम हो जाता है। वह दुःसाध्य रोगों से विमुक्त होकर स्वास्थ्य लाभ करता तथा निर्भय भाव से संसार में भ्रमण करता है।
इस प्रकार की साधना के परिणामस्वरूप साधक कालजयी बन जाता है। उसका वध किसी प्रकार से भी सम्भव नहीं होता। उसे गुणप्रदायिनी अणिमादिक अष्ट सिद्धियों (अणिमा, महिमा, गरिमा, लधिमा, प्राप्य, प्राकाम्य, ईशित्व एवं वशित्व) की उपलब्धि हो जाती है।
उसके समूचे शरीर में स्वाभाविक गति से वायु का संचरण होने के फलस्वरूप उसमें रस का वर्धन होता है। तात्पर्य यह है कि उसका प्राणवायु सुषुम्ना में प्रवेशित हो जाता है। उसके सहस्रदल कमल से निरन्तर स्त्रवित होने वाले अमृत में भी वृद्धि होती है।
नाभिस्थल में अवस्थित रहने वाला तीसरा पद्म मणिपूरचक्र के नाम से सम्बोधित किया जाता है। यह कांचन वर्ण के समान चमकीला और दश पंखुड़ियों से युक्त रहता है।
इस कमल के दल पर 'ड' से 'फ' तक के वर्ण अर्थात् ड ढ ण त थ द ध न प और फ वर्ण क्रमानुसार अक्षरान्वित रहते हैं। उस स्थान में सर्वमंगलदायक रुद्र नामक सिद्ध और परमधर्मिणी लाकिनी नाम्नी देवी का निवास रहता है। इसके देवता भगवान विष्णु कहे गये हैं।
जो साधक इस मणिपूर नामक कमलचक्र का सर्वदा ध्यान करते रहते हैं, वे सर्व सिद्धियों की खान पाताल नाम्नी सिद्धि को प्राप्त कर लेते हैं।
उनकी सभी अभिलाषाएँ पूरी होती और उनके रोग-शोकादि दुःखों का निवारण होता है। वह कालजयी बनकर परकाया-प्रवेश की शक्ति भी पा लेता है। इस साधना के द्वारा किसी धातु को स्वर्ण में परिवर्तित करने की क्षमता आ जाती है।
सिद्ध पुरुषों के दर्शन करने तथा अदृष्ट औषधियों को देखने और उन्हें पहचानने में भी सफल हो जाता है। इसके अतिरिक्त वह पृथिवी में गुप्त रूप से रखे हुए धन को देखने की शक्ति भी पा लिया करता है।
यह अनाहतसंज्ञक चतुर्थ पद्म हत्प्रदेश में अवस्थित रहा करता है। इसकी बारह पंशुड़ियाँ पर क्रमशः 'क' से 'ठ' तक अर्थात् क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट और ठ के अक्षरों से अंकित रहता है। यह कमल परमोज्ज्वल और रक्तवर्णीय होता है। यह प्रसन्नस्थल वायु के बीज का अर्थात् प्राणवायु का आधार स्तम्भ होता है।
इस कमल के तेजोराशि को बाणलिंग कहा जाता है। इसके स्मरणमात्र से ही साधक लौकिक एवं पारलौकिक सुखों का उपभोग करने में समर्थ हो जाता है।
जिस अनाहत नामक पद्म के सिद्ध शिवजी और अधिष्ठातृ देवी काकिनी है उस हत्कमल में जो सर्वदा ध्यानावस्थित रहते हैं उनके निकट देवांगनाएँ भी कामासक्त भाव से आती है।
इस साधन के द्वारा योगी त्रिकालज्ञ बन जाता है। अर्थात् उसमें दूर शब्दश्रवण, दूरदर्शन तथा सूक्ष्मातिसूक्ष्म दूरस्थ वस्तुओं के अवलोकन की क्षमता आ जाती है। वह नभचारी जीवों की भाँति स्वेच्छ्या आकाश में भी उड़ान भर सकता है।
ऐसे साधक को सिद्ध पुरुषों तथा योगियों के दर्शन मिलते हैं। खेचरी मुद्रा की सम्पन्नतावश वह आकाशगामी जीवों को भी अपने अधीन बना लेता है।
जो साधक इस परम अविनश्वर द्वितीय वाणलिंग का ध्यान धारण करता है उसे खेचरी और भूचरी मुद्रा की सिद्धि मिल जाया करती है।
इस अनाहत पद्म के माहात्म्य का वर्णन करना नितांत असम्भव है। इसे ब्रह्मादि देवता भी किसी के प्रति व्यक्त नहीं करते।
विशुद्ध नामधारी पंचम पद्म की अवस्थिति कंठप्रदेश में रहती है जिसका रंग सोने के समान सुनहला तथा सोलह स्वरों से युक्त पोडश पंखुड़ियों वाला कहा गया है। इसकी पंखुडियों पर 'अ' अक्षर से लेकर 'अः' तक के सोलह स्वर अर्थात् अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ल, लू, ए, ऐ, ओ, औ, अं तथा अः स्वर विभूषित रहते है। इस स्थान में छगलांड नामक सिद्ध तथा अधिष्ठातृ देवी शाकिनी सदैव निवसित रहते हैं।
इस विशुद्ध चक्र में प्रतिदिन ध्यानरत रहने वाले पुरुष ही योगीश्वर तथा पंडित कहलाते हैं। इस विशुद्ध पद्मा के ध्यान धारण के फलस्वरूप उसे चारों वेदों (ऋक्, यजुः, साम एवं अथर्व) की सांगोपांग उपलब्धि उसी प्रकार हो जाती है जिस प्रकार किसी को धनागार की होती है।
यदि विशुद्ध पद्म में अवस्थित योगी कदाचित् क्रोधित हो उठे तो उसके क्रोधावेश से सम्पूर्ण त्रैलोक्य थर्रा उठता है। यह बात निश्चित रूप से सत्य है।
संयोगवश जब साधक का चित्त इस कमल में विलीन हो जाता है तब वह समस्त बाह्य विषयों को छोड़कर शरीर के अन्दर ही प्राणवायु के साथ रमणशील रहा करता है।
उसमें इतनी दृढ़ता आ जाती है कि उसका क्षय नहीं होता तथा उसका शरीर वज्रवत् कठोर हो जाता है। जब सहस्त्र वर्षों की समाधि पूर्ण कर लेने के पश्चात् उसकी समाधि टूटती है तो उसकी मनोवृत्ति का पुनरावर्तन संसार में हो जाता है।
इतना लम्बा समय व्यतीत होने पर भी उसे विगत काल क्षणभर व्यतीत होने-सा जान पड़ता है। अर्थात् समाधि की अवस्था में योगी को काल का बोध नहीं होता।
भौहों के मध्यवर्ती भाग में स्थित आज्ञा पद्म में दो श्वेतवर्गीय दल होते हैं जिन पर 'हं' और 'क्ष' बीजाक्षर अंकित रहते हैं। उस स्थान में महाकाल नामक सिद्ध तथा अधिष्ठातृ देवी हाकिनी का निवास रहता है। इस आज्ञाचक्रसंज्ञक कमल के अधिष्ठाता देवता परमात्मा कहे जाते हैं।
उस आज्ञापद्म के बीच में शारदीय चंद्र की आभावाला परम तेजवान् चंद्रबीज अर्थात् 'ठ' बीज की अवस्थिति रहती है। उस बीज का बोध हो जाने पर परमहंस पुरुष में कभी न तो थकावट आती है और न ही किसी प्रकार की क्लेशानुभूति होती है।
इस महान तेजवान् प्रकाश को सदा ही गुप्त रखना आवश्यक होता है। इसके चिंतनमात्र से निश्चय ही परमसिद्धि की उपलब्धि होती है ।
शिवजी ने कहा - हे पार्वति! उस स्थान में तुरीयावस्था वाले तृतीय लिंग के रूप में मुक्तिप्रदाता मैं स्वयं ही विराजमान रहा करता हूँ। इसके ध्यानमात्र से साधक मेरे समान योगीन्द्र बन जाता है। अर्थात् जो योगी तुरीयावस्था में तृतीय लिंगरूप मेरा ध्यान करता है वह सायुज्य मुक्ति (सालोक्य, सारूप्य, सामीप्य और सायुज्य-इन चार प्रकार की मुक्तियों में से एक। सायुज्य मुक्ति में साधक परमात्म-स्वरूप होकर उसी में समा जाता है) पाने का अधिकारी बन जाता है।
शरीरस्थ इड़ा और पिंगला नाम्नी नाड़ियों को वरणा और असी (एक नदी) अर्थात् वाराणसी कहा जाता है। इसी वाराणसी नगर के मध्य मैं 'विश्वनाथ' के नाम से स्वयं ही प्रतिष्ठित रहता हूँ।
तत्त्ववेत्ता ऋषियों ने अनेक शास्त्रों में अनेक बार वाराणसी क्षेत्र के महत्त्व का निरूपण परमतत्त्व के रूप में किया है। अर्थात् सभी शास्त्रों और ऋषियों ने वाराणसी को परमतत्त्व के रूप में स्वीकार किया है।
मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) के द्वारा सुषुम्ना नाड़ी ब्रह्मरन्ध्र तक चली गयी है तथा इड़ा नाड़ी सुषुम्ना को आवृत करती हुई आज्ञाचक्र के दक्षिणी ओर से चलकर बाम नासारन्ध्र में जा पहुँचती है। इसी को 'गंगा' की संज्ञा दी गयी है।
ब्रह्मरन्ध्रस्थ सहस्रसार कमल कंद में अवस्थित योनि में सदैव ही चन्द्रमा सुशोभित रहता है।
उस त्रिकोणाकार योनि द्वारा निरन्तर चन्द्रामृत का स्राव होता रहता है। उस चन्द्रमा से क्षरित होने वाला अमृत इड़ा नाड़ी द्वारा सदा ही धारारूप में गमनशील रहता है।
इड़ा नाड़ी का बहाव वाम नासापुट में होने के फलस्वरूप योगीवृन्द इसे गंगा के नाम से संबोधित करते हैं ।
जब इड़ा नाड़ी आज्ञाचक्र के दक्षिण भाग से चलकर वाम नासापुट में प्रस्थान करती है तब इसी को उद्गवाहिनी गंगा कहते हैं।
अतः इड़ा और पिंगला नाड़ी के मध्यवर्ती स्थान को वाराणसी समझकर चिन्तना करनी चाहिए। इस इड़ा नाड़ी की भाँति पिंगला नाड़ी भी आज्ञाचक्र के वाम भाग से चलकर दाएँ नासापुट में चली जाती है। अतएव हे देवि! इसी कारण मैंने पिंगला का असी नामकरण किया है।
चार पंखुड़ियों वाले मूलाधार कमल कंद में योनि की विद्यमानता रहती है और वही सूर्य का आवास-स्थान है।
उस सूर्यमण्डल से लगातार विष का क्षरण होता रहता है।
वह विष पिंगला नाड़ी द्वारा धारारूप में सदा प्रवहमान रहा करता है। यह पिंगला नाड़ी दाएँ नासापुट की ओर चली जाती है।
यह पिंगला नाम्नी नाड़ी आज्ञापद्म के बाएँ भाग से चलकर दाहिने नासापुट में चली गयी है। इसी हेतु इसे असी नाम से पुकारा जाता है।
इस आज्ञाचक्र के अधिष्ठाता देव महेश्वर कहे गये हैं। योग-चिन्तक साधकों का कहना है कि इस आज्ञा नामक कमल के ऊपर तीन पीठस्थानों की अवस्थिति है जिन्हें नाद, बिन्दु और शक्ति के नाम से सम्बोधित किया जाता है। ये तीनों ही दोनों भौहों के बीच में स्थित भालपद्म में शोभायमान रहते हैं।
जो साधक इस आज्ञापद्म के ध्यान में गुप्त रूप से संलग्न रहा करते हैं उनके पूर्व जन्मार्जित सभी फल निर्बाध रूप से विनष्ट हो जाया करते हैं। अर्थात् उन्हें किसी फल को भोगने की आवश्यकता नहीं रह जाती।
इस आज्ञाकमल के ध्यान में निरन्तर साधनारत रहने वाले योगी के लिए मूर्तिपूजन या मंत्रजाप करना अनावश्यक होता है।
ऐसे साधक के प्रति यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, अप्सरा तथा किन्नरादिगण उसके अधीन रहकर उसकी चरण-सेवा में निरत रहा करते हैं।
जो योगसाधक अपनी जिल्हा को ऊपर की ओर पलटकर तालुमूल अर्थात् गलघंटिका से सटा दे और
स्थिरचित्त से क्षणभर भी उस भयविनाशक आज्ञाचक्र के ध्यान में निमग्न हो जाय तो उसके समस्त पाप-पुंज उसी समय नाश को प्राप्त हो जाते है।
पूर्वकथित पंच पद्मों के जो-जो फल वर्णित किये गये हैं वे सभी फल केवल इस आज्ञाचक्र के ध्यान से एक साथ ही मिल जाया करते हैं।
इस आज्ञापद्म के ध्यान में सदा ही रत रहने वाल प्रतिभाशाली साधक वासनारूपी महाबन्धन को तोड़कर आनंदविभोर रहा करते हैं। अर्थात् इसके निरन्तराभ्यास से वासना के बंधन का उन्मूलन हो जाता है।
जो प्रबुद्ध और धर्मनिष्ठ योगी अन्तकाल में इस आज्ञापद्म का ध्यान करता है उसके प्राण परमेश्वर में समाहित हो जाते हैं।
जो पुरुष उठते-बैठते, चलते-फिरते, सोते-जागते इस आज्ञाचक्र के ध्यान में सदैव निरत रहते हैं, वे यदि पाप-परायण भी हों तो भी उनकी मुक्ति सुनिश्चित रहती है।
इस आज्ञापद्म का ध्यानी साधक निश्चय ही राजयोग का अधिकारी बनता है। यह बात नितान्त ही सत्य है। वह अपने तेज के फलस्वरूप समस्त बंधनों से स्वतः ही मुक्त हो जाता है। उसे मोक्षलाभ के लिए किसी अन्य उपाय का सहारा नहीं लेना पड़ता।
हे देवि! इस दो पंखुड़ी वाले कमल के माहात्म्य का वर्णन करने में कोई भी प्राणी सक्षम नहीं हो सकता। इसके माहात्म्य का अल्प मात्रा में ज्ञान रखने वाले ब्रह्मादि देवगण भी मेरे ही द्वारा जान सके हैं।
इसी आज्ञाचक्र के ऊपर तालुमूल में सहस्त्रदलीय कमल की अवस्थिति रहती है। वहीं पर ब्रह्मरन्ध्र के विवर मूल में सुषुम्ना नाड़ी की भी स्थिति होती है।
उसका मुख नीचे की ओर तालुमूल में वर्तमान रहता है। मूलाधार से योनिस्थान तक अन्य जितनी भी नाड़ियाँ हैं वे सभी इस तत्त्वबोध की बीजरूपिणी तथा ब्रह्मपंथ-प्रदायिनी सुषुम्ना नाड़ी के आश्रयभूत रहती हैं।
तालुस्थान में स्थित रहने वाले सहस्रार के कमल-कन्द में एक योनि उसके पृष्ठभाग में अर्थात् पीछे की ओर मुखवाली होकर रहती है।
उस योनि के बीच वाले रन्ध्र में सुषुम्ना नाड़ी की अवस्थिति रहा करती है। उस रन्ध्र को ही ब्रह्मरन्ध्र का नाम दिया गया है तथा मूलाधार पद्म भी कहा जाता है।
यह कुंडलिनी, सुषुम्ना नाड़ी के विवर में सदैव ही सुशोभित रहती है।
सुषुम्ना के आन्तरिक भाग में स्थित रहने वाली इस नाड़ी को चित्रा नाड़ी कहा जाता है। हे पार्वति! इसी चित्रा नाड़ी से ही ब्रह्मरन्ध्र की कल्पना की गयी है, ऐसा मेरा अभिमत है।
इस चित्रानाड़ी के ध्यानमात्र से ब्रह्मज्ञानोत्पत्ति होती है जिसके फलस्वरूप योगाभ्यासी अपने समस्त पापों का उन्मूलन कर सांसारिक आवागमन के बंधन में नहीं आता।
यदि दाएँ हाथ के अँगूठे को मुख में प्रविष्ट कराकर पूरा मुख पूरी तरह से बन्द कर लिया जाय तो शरीर में संचरित होने वाला वायु स्थिरत्व पा लेता है। इस वायुरोधी प्रक्रिया के द्वारा निश्चय ही वायु का स्थिरीकरण होता है।
प्राणवायु के स्थिरीकरण के पश्चात् अभ्यासी को सांसारिक आवागमन के चक्र में परिभ्रमण करने से छुटकारा मिल जाता है अर्थात् उसे जन्म-मरण के फन्दे में बंधना नहीं होता। इसी कारण योगीजन प्राणवायुधारक प्रक्रिया की ओर उन्मुख हुआ करते है।
इस प्रकार के अभ्यास से समस्त मलावृत नाड़ियाँ खुल जाती है। आशय यह है कि काम, क्रोध, लोभ, मोहादि अष्ट विकारों के परिणामस्वरूप बन्द पड़े हुए मुख अनावृत हो जाते हैं तथा कुंडलिनी शक्ति भी ब्रह्मरन्ध्र का त्याग कर देती है जिसके फलस्वरूप जीव का परमात्मा के साथ एकत्व स्थापित हो जाता है।
वायु के सन्निरोध होने से समस्त नाड़ियाँ उस वायु से परिपूर्ण हो उठती हैं। तदनन्तर कुंडलिनी शक्ति अपने बंधन को परित्याग कर ब्रह्मरन्ध्र के मुख को खुला छोड़कर बाहर निकल आती है। ऐसी अवस्था आने पर सुषुम्ना नाड़ी में सदैव ही अबाध गति से प्राणवायु का प्रवाह होने लगता है।
मूलाधार पद्म में स्थित रहनेवाली योनि के बायीं ओर इड़ा और दायीं ओर पिंगला नाड़ी का निवास माना गया है। इन्हीं द्वय नाड़ियों के बीच में रहने वाली सुषुम्ना नाड़ी योनिस्थान तक चली जाती है।
उस सुषुम्ना के मध्य भाग में ब्रह्मरन्ध्र की स्थिति होती है। इसकी ज्ञानोपलब्धि होने पर प्रबुद्ध साधक सांसारिक कर्मबंधन से रहित हो जाता है।
उक्त तीनों नाड़ियों - इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना का मिलन-स्थल ब्रह्मरन्ध्र का मुख होता है। अर्थात् ये तीन नाड़ियाँ त्रिवेणी संगम के समान होती हैं। इस संगम में स्नान करने वाले ज्ञानीजन निश्चय ही उत्तम मुक्ति पाने के पदाधिकारी होते हैं।
गंगा- यमुनारूपी इड़ा-पिंगला के मध्य सरस्वतीस्वरूपा सुषुम्ना नाड़ी अदृश्य रूप से वर्तमान रहा करती है। इसमें स्नान करने वाला स्नानाचीं धन्य हो जाता है और उसे परम दुर्लभ गति प्राप्त होती है।
इन तीन प्रकार की नाड़ियाँ में इड़ा गंगा, पिंगला यमुना तथा इनके मध्य भाग में सुषुम्ना सरस्वती के रूप में प्रवाहित होती रहती है। इन्हीं तीनों को त्रिवेणी संगम का नाम दिया गया है। इस संगम में स्नान करना परम दुर्लभ है।
इस इड़ा और पिंगला के संगमस्थल में मानसिक रूप से स्नानकर्ता साधक सम्पूर्ण पापों से विमुक्त होकर शाश्वत ब्रह्म में विलीन हो जाता है।
इस त्रिवेणी संगम में स्नानोपरांत जो पितृकर्म अर्थात् श्राद्धादि कर्मों की क्रिया करते हैं वे इसके फलस्वरूप अपने पितरों का उद्धार कर स्वयं मोक्षलाभ करते हैं।
जो साधक इस त्रिवेणी संगम में नित्य (प्रतिदिन किया जाने वाला), नैमित्तिक (किसी विशेष पर्व पर किया जाने वाला) तथा काम्य तर्नो (विशिष्ट इच्छापूर्ति हेतु किया जाने वाला) प्रतिपादन करते हुए मनसा चिंतन करते हैं, उन्हें अमोघ फल की प्राप्ति होती है।
यदि विशुद्ध बुद्धि वाले योगाभ्यासी इस त्रिवेणी संगम में एक बार भी स्नानार्थ डुबकी लगा लेते हैं तो वे अपने शेष सभी पापों को जलाकर सुखोपभोक्ता बन जाते हैं।
वे पवित्रा अथवा अपवित्रा अवस्था में रहकर भी इस संगम-स्नान से पूर्णतया पवित्र हो जाते हैं। इस बात को कभी मिथ्या नहीं जानना चाहिए।
जो योगी मृत्युकाल में, अपने मन में ऐसी भावना रखता है कि मैं इस त्रिवेणी संगम में डुबकी लगा रहा हूँ तो वह उसी क्षण अपने प्राणपखेरू को छोड़कर मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
इस तीर्थ से उत्तम अन्य कोई भी तीर्थ त्रैलोक्य में नहीं होता । इस त्रिवेणी संगम में मानसिक स्नान की रीति को सदैव ही गुप्त रखना चाहिए। अर्थात् इसे किसी अयोग्य व्यक्ति के समक्ष प्रकट नहीं करना चाहिए ।
जो साधक आधे क्षण भी अपने चित्त को ब्रह्मरन्ध्र में स्थिर कर ले तो वह सर्व पापों से रहित होकर मोक्ष को पा लेता है।
हे पार्वति! ब्रह्मरन्ध्र में मन को स्थिर रखने वाला योगाभ्यासी अणिमादिक सिद्धियों का भोक्ता बनकर स्वेच्छया मुझमें ही विलीन हो जाता है। अर्थात् इस प्रकार के अभ्यास द्वारा सिद्धाभिलाषी सिद्धि को तथा मोक्षाभिलाषी मोक्ष को प्राप्त कर लिया करता है।
शिवजी बोले - हे देवि! ब्रह्मरन्ध्र का ध्यानकर्ता प्राणी मेरा प्रियपात्र बन जाता है तथा वह पाप-पुंजों को विजित कर मोक्षमार्गगामी हो जाता है। वह अपने ज्ञानोपदेश द्वारा अन्य मोक्षार्थियों का भी सांसारिक आवागमन से उद्धार कर दिया करता है।
हे देवि! मेरे द्वारा कथित इस ब्रह्मरन्ध्र का ध्यान योगिजनों के लिए परम प्रियकारक होता है। अतः इसे सावधानीपूर्वक गुप्त रखना आवश्यक है।
इस अगम्य पथ का पथिक बनना ब्रह्मादि देवों के लिए भी दुष्कर कार्य होता है। मैंने पूर्व में सहस्रार पद्म के मध्य में जिस योनिमंडल को बतलाया है, उसी के नीचे चन्द्रमा का अवस्थान है। इस चन्द्रमा का ध्यान प्रबुद्ध योगी सदा ही किया करते हैं।
इस चन्द्रमण्डल के स्मरणमात्र से श्रेष्ठ योगी देवताओं और सिद्धों के समान संसार में पूजनीय बन जाता है। अर्थात् वह समस्त ऐश्चयों का स्वामी बन जाता है।
योगी को शिरस्थ कपाल-कुहर में क्षीरसागर का ध्यान करना चाहिए। साथ ही वहीं पर स्थित सहस्रार पद्म में चन्द्रमा का चिन्तन करना भी आवश्यक है।
उक्त शिरस्थ कपाल-कुहर में षोडश कलाओं तथा अमृत-किरणों से परिपूर्ण हंस नामक निरंजन आत्मा का स्मरण करे।
इस प्रकार तीन दिनों के सतत अभ्यास द्वारा निःसंशय ही आत्म-साक्षात्कार होता है। उस आत्म-दर्शन के फलस्वरूप साधक के सभी पातक जलकर राख हो जाते हैं।
शिरस्थ चंद्रमा में चिंतन के परिणामस्वरूप चिंतक में अनुत्पन्न विषयों की अनुभूति होने लगती है। इस प्रकार की चिन्तना से चित्त का विशुद्धिकरण होकर पाँच प्रकार के पापों का विनाश हो जाता है।
उसके सभी अनिष्टकारी ग्रह अनुकूल हो जाते, सभी उपद्रवों के औपसर्गिक लक्षण शमित होते तथा योद्धाओं को रणभूमि में विजय-लाभ के अवसर मिलते हैं।
इस शिरस्थ चंद्र में ध्यान-परायण योगी को खेचरी-भूचरी की सिद्धि अवश्य ही मिलती है। हे देवी पार्वति! इसका ध्यानाभ्यासी साधक निश्चय ही सिद्ध पुरुष हो जाता है।
मेरा यह कथन बारम्बार सत्य है। ऐसा साधक मेरे समतुल्य हो जाता है। यही परम योग और साधकों का सिद्धिदाता है।
तालु के ऊपरी भाग में दिव्य रूप सहस्रार कमल ब्रह्माण्डरूप शरीर के बाह्य भाग में स्थित रहता है। यह मुक्तिप्रदाता कमल कैलास नाम से विख्यात है।
शरीररूपी कैलासशिखर पर महेश्वर का निवास कहा गया है। यह कुलहीन नामक ईश्वर सदैव अविनश्चर होता है। इसमें किसी प्रकार का घटाव-बढ़ाव या परिवर्तन नहीं होता।
इस कैलासीय स्थान का ज्ञान ग्रहण कर लेने पर मानव का संसार में पुनरागमन नहीं होता। इस ज्ञान के अभ्यासी साधक में समस्त प्राणियों के हेतु उत्पादक और संहारक शक्ति आ जाती है। अर्थात् इस प्रकार का ज्ञान-सम्पन्न योगी समस्त कर्म-अकर्म करने में सक्षम हो जाता है।
यह कैलाससंज्ञक स्थान परमहंस का आवासीय स्थल होता है। अतः इस स्थान में अपने चित्त का स्थिरीकरण करने वाला साधक समस्त रोगों से मुक्ति दिलाने तथा मृत्यु पर विजय प्राप्त कराने वाला हो जाता है। अर्थात् वह दीर्घजीवी बन जाता है।
इस कुलसंज्ञक ईश्वर में अपनी मनोवृत्ति का विलयन कर लेने वाला योगी अचल समाधि में निमग्न हो जाया करता है।
उसमें जागतिक विषयों की विस्मृति तथा विचित्र प्रकार की क्षमता की उत्पत्ति हो जाती है। यह कथन बिलकुल ही सत्य है।
सहस्रदल कमल से टपकते हुए अमृत का सतत पान करने वाला साधक अपने कुल सहित मृत्यु पर भी विजय-लाभ कर लेता है। अर्थात् वह मृत्यु से भी अवध्य हो जाता है।
इसी सहस्रार कमल में कुलस्वरूपिणी कुंडलिनी का विलय होता है। उस कुंडलिनी के विलयोपरान्त चारों प्रकार की सृष्टि (अण्डज, पिण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज्ज) भी ईश्वर में समाहित हो जाती है।
इस सहस्रार कमल का बोध हो जाने पर मनोवृत्तियों का लय हो जाता है। इसी हेतु योगी के लिए यह अनिवार्य है कि वह इस ज्ञानोपलब्धि में निरपेक्ष भाव से सदा लगा रहे।
चित्तवृत्ति के विलय होने के अनन्तर अविभक्त ज्ञानरूप निरंजन आत्मा की ज्योति योगी के हृदय में प्रकाशित होने लगती है।
पूर्वकथित रीति से शरीर के बाहरी भाग में अपने प्रतीक स्वरूप का साधक को ध्यान करना उचित है। जब ध्यानावस्था में चित्त का स्थिरीकरण हो जाय तब उसे महान शून्य का चिन्तन करना आवश्यक होता है।
अनन्तरूप शून्याकाश में करोड़ों सूर्य के समान दीप्तिमान तथा करोड़ों चन्द्रमा की सुशीतलता के समान प्रकाशवान आत्मदर्शन के अभ्यासी साधक में सिद्धि सुलभ होती है।
जो प्राणी आलस्यविहीन होकर प्रतिदिन उस शून्य के ध्यान में तत्पर रहता है वह एक वर्ष के अन्दर ही सम्पूर्ण सिद्धियों की प्राप्ति निःसन्देह रूप से कर लिया करता है।
जो साधक इस शून्य में आधे क्षण भी अपने चित्त को निश्चल बना लेता है, वह निश्चय ही समस्त भुवनों में भक्त और पूजनीय माना जताा है।
उसके दर्शनमात्र से हो मानव सांसारिक आवागमन के चक्र में भ्रमण करने से मुक्त हो जाता है। अर्थात् उसका पुनर्जन्म पुनः सम्भव नहीं होता। स्वाधिष्ठान पथ का अनुसरण करते हुए इसका अभ्यास किया जाना चाहिए।
शिवजी बोले - हे देवि! मैं इसके माहात्म्य वर्णन में सर्वथा ही अशक्य हूँ। इसका अभ्यासी कोई योगी ही इसके महत्त्व को जान सकता है।
इसकी महत्ता को जानने वाले योगी मेरे ही समतुल्य होते हैं। इसकी साधना करने से निश्चय ही साधक को अष्टसिद्धियों की उपलब्धि होती है।
हे देवी पार्वति! मैंने जिस राजयोग का कथन किया है वह सभी प्रकार से गोपनीय है। अब मैं जिस राजाधिराज योग का विस्तृत वर्णन कर रहा हूँ जिसे तुम श्रणग करो।
इसके लिए किसी निर्जन स्थान में अवस्थित मठ में जाकर साधक को गुरुपूजन के पश्चात् स्वस्तिकासन (दोनों घुटनों तथा जाँघों के बीच पैर के दोनों तलुओं को लगाकर बैठने की विधि) की स्थिति में बैठकर ध्यान में लग जाना चाहिए।
वेदान्त शास्त्र में कथित विधियों के अनुसार प्रबुद्ध साधक अपने चित को निराधार करके केवल जीव की ही चिंतना करे।
इस प्रकार के ध्यानाभ्यास से महान सिद्धि की उपलब्धि होती है। ऐसी दशा में साधक मनोवृत्तियों का निरोध करके स्वयं में परिपूर्ण हो जाता है। अर्थात् वह आत्मस्वरूप बन जाया करता है।
उक्त प्रकार की साधना में निरत रहने वाला योगी पूर्णतया कामनारहित हो जाता हैं। अर्थात् उसके मन में कुछ भी पाने की लालसा नहीं रह जाती। उसके मुख से कभी अहंकारपूर्ण शब्द भी नहीं निकलते।
वह समस्त सांसारिक पदार्थों को आत्मवत् ही समझता है। जिसके मन से बंधन और मोक्ष का भेद मिट जाता है तथा जो नित्य ही आत्मदर्शन हेतु चिन्तनशील रहता है वह निश्चय ही मोक्ष का भागी होता है। ऐसा योगी उत्तम भक्त कहलाता और समस्त भुवनों में पूज्य माना जाता है।
योगी को स्वयं में जीवात्मा-परमात्मा की समरूप भावना रखकर चिंतन करना चाहिए। उसे 'मेरा और तेरा' का भेदभाव मिटाकर एक अखण्ड ब्रह्म के ध्यान में ही चित्त को समाविष्ट करना चाहिए।
जिस अध्यारोप-प्रत्यारोप में सभी वस्तुओं का विलय होता है उसी बीज का आश्रय ले जन-समुदाय से दूर रहकर एकाकी रूप से साधना पूरी करनी चाहिए।
श्रमातुर व्यक्ति साक्षात् ब्रह्म को छोड़कर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष के चक्कर में पड़कर भ्रमित रहा करते हैं।
ऐसे लोग इस संसार को ही सत्य मान लेते हैं और उसी में विलीन हो जाते हैं। अर्थात् वे सांसारिक बंधन से कभी नहीं छूट पाते।
जिस अभ्यास के द्वारा अज्ञान का विनाश और ज्ञान का प्रकाश होता हो वैसे अभ्यास को निःसंग होकर योगसाधक को करने चाहिए।
बुद्धिमान साधक विषय-वासनाओं से इन्द्रियों को विमुख करके संगरहित होकर उसी में सुषुप्ति के समान विलीन हो जाते हैं।
इस प्रकार के अभ्यासी साधक में स्वयं ही ज्ञानोदय हो जाया करता है। उन्हें गुरु द्वारा कथित मार्ग के अनुसरण करने की भी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। पुनः उसे अन्य प्रकार की बातों में रुचि नहीं रहती। उस विस्मयकारी ज्ञान में उसकी प्रवृत्ति स्वतः ही हो जाती है।
यह ब्रह्म, मन और वाणी से सदा परे होता है। योगसाधन तथा स्वच्छ ज्ञान के द्वारा वह स्वतः ही आलोकित होने लगता है, यह कथन अटल सत्य है।
हठयोग के अभाव में राजयोग तथा राजयोग के अभाव में हठयोग की सिद्धि का मिलना असम्भव होता है। अतः साधक को श्रेष्ठ गुरु के उपदेशानुसार हठयोग के मार्ग में अग्रसर होना चाहिए।
जो प्राणी इस देह में वर्तमान रहकर भी योग का आश्रयण नहीं करते वे केवल इन्द्रिय-सुख के उपभोग हेतु ही संसार में जीवित रहा करते हैं। यह बात निःसन्देह रूप से सत्य है कि ऐसे लोग झूठे सुख के मोह में पड़कर सम्पूर्ण जीवन को बेकार बना देते हैं।
योगाभ्यास के प्रारम्भिक काल से लेकर योगसिद्धि मिलने तक विचारवान साधक को अल्पाहारी होना चाहिए, क्योंकि अपरिमित आहार से योग साधन सफल नहीं होता।
योगसाधन की सफलता हेतु साधक को अल्पाहारी तथा अल्पभाषी होना परम आवश्यक होता है। इसके बिना उसे सिद्धिप्राप्ति से वंचित रह जाना पड़ता हैं।
योगसाधक के लिए यह आवश्यक है कि वह जन-सम्पर्क से दूर रहकर अल्पभोजी और अल्पभाषी बने। इस आचरण के प्रतिकूल कार्य करने पर उसे मुक्ति नहीं मिल सकती। हे देवी पार्वति! मैं इस बात को पूर्णरूप से सत्य ही कहता हूँ।
उसे संगरहित होकर सुनसान स्थान में अपनी साधना का अभ्यास करना उचित है। उसे संसारी व्यक्तियों से उतना ही व्यवहार रखना चाहिए जितना आवश्यक हो।
आश्रमधर्म का पालन करना भी तभी तक उचित कहा गया है जब तक उसकी आवश्यकता बनी रहे। इस प्रकार कर्म के द्वारा सम्भव होने वाले जितने भी ज्ञानादि कर्म हैं, उन्हें केवल निमित्तमात्र समझकर करने वाले को दोष का भागी नहीं बनना पड़ता।
यदि कोई गृहस्थाश्रमी स्थिरचित्त से स्वगृह में ही योगसाधना करे तो उसे भी निःसन्देह रूप से सिद्धि सुलभ हो सकती है। इसमें किसी प्रकार का सोच-विचार करना अनावश्यक होता है।
ऐसा गृहस्थाश्रमी जो पाप-पुण्य से निर्लिप्त रहकर सभी प्रकार के संग-साथ का परित्याग कर देता है वह घर में वास करता हुआ भी पाप-पुण्य के जाल में नहीं फँसता।
यदि उस गृहस्थ योगी के द्वारा सांसारिक पदार्थों के संग्रहण में किंचित् पाप भी हो जाय तो भी उस पर पाप की छाया नहीं पड़ती।
शिवजी बोले - हे देवि! अब मैं ऐसे उत्तम मंत्र साधन का कथन करता हूँ जिसके द्वारा साधक को ऐहिक और पारलौकिक - दोनों सुखों की प्राप्ति एक साथ हो सके।
इस सर्वश्रेष्ठ मंत्र का ज्ञान प्राप्त कर लेने पर उसे योगसिद्धि अवश्य ही मिलती है। योग के सहित उसकी साधना करने पर वह सर्वाभीष्ट सुख का दाता होता है।
चतुर्दल मूलाधार पद्म के मध्य विद्युत्कांति के समान वाग्भवबीज, हृत्कमल में बन्धूक पुष्प (गुलदुपहरिया) के सदृश
प्रभायुक्त कामबीज तथा आज्ञाचक्र में शक्तिसंज्ञक बीज की अवस्थिति रहती है जो करोड़ों चन्द्रमा की ज्योति के समान प्रभावान होता है।
उक्त प्रकार के ये तीनों ही बीज परम गोपनीय तथा भोग-मोक्षप्रदायक कहे गये हैं। अतः यह योगियों के लिए साधनीय है। इन तीनों मंत्रों की शिक्षा गुरु से लेकर मंत्रजाप में संलग्न होना चाहिए।
मंत्रों का जप द्रुत-विलम्बित (कभी शीघ्र या कभी देर से) रूप से न करके प्रत्येक अक्षरों का स्पष्ट उच्चारण करते हुए स्थिरचित्त से मन्त्रोच्चार करना आवश्यक बतलाया गया है।
शास्त्रोक्त विधानानुसार देवी के समक्ष एकाग्रतापूर्वक बैठकर तीन लाख की संख्या में हवन तथा एक लाख मंत्रजाप साधक को करने चाहिए।
जपान्त में सुविज्ञ साधक को योनि के आकार का एक कुण्ड बनाकर उसमें करवीर (कनेर, कनइल) पुष्प के साथ गुड़, दूध और घी मिलाकर अग्नि में आहुति देनी चाहिए।
यदि इस प्रकार प्रज्ञावान साधक अनुष्ठानपूर्वक देवी त्रिपुरसुन्दरी की उपासना करे तो उसे अभीष्ट फल की उपलब्धि होती है।
इस सिद्धि-लाभ हेतु पूर्वकथित विधि से गुरु को प्रसन्न करके मंत्रदीक्षा लेनी चाहिए। इस प्रक्रिया को अपनाने वाला मंदभागी साधक भी बड़भागी बनने का गौरव प्राप्त कर लेता है।
इंद्रियनिग्रहपूर्वक एक लाख जप पूर्ण करने वाले साधक के दर्शनमात्र से ही कामातुरा नारियाँ लज्जाविहीन एवं निर्भय होकर साधक के समक्ष अवनत हो जाया करती हैं।
इस मंत्रजाप को दो लाख की संख्या में पूरा करने वाले जापक के निकट कुलांगनाएँ भी उसी प्रकार गमन करती हूं जिस प्रकार वे किसी तीर्थस्थान में निःसंकोच भाव से करती हैं। अर्थात् ऐसी नारियाँ भी उस साधक को अपना सर्वस्व लुटा देती हैं।
जो मंत्रजापक इसका तीन लाख जप कर लेता है उसके सामने मंडलाधिपति राजा भी नतमस्तक होकर उसके अधीन हो जाया करते हैं। छह लाख जप पूर्ण कर लेने पर वह स्वयं ही बल, वाहन और सेनाओं से युक्त भूमिपति बन जाता है।
इस मंत्र के बारह लाख जप कर लेने के पश्चात् यक्ष, राक्षस तथा नागादि सभी जीव सदा ही उसके आदेश का अनुपालन किया करते हैं।
साधक के पन्द्रह लाख जप कर लेने पर सिद्ध, विद्याधर, गंधर्व (देवगायक) और अप्सरा (देव नृत्यांगना) आदि सभी प्राणी उसके अनुगामी बन जाते हैं। यह बात निःसन्देह रूप से सत्य कही गयी है।
हठयोगी को विशिष्ट प्रकार की श्रवण-शक्ति तथा सर्वज्ञान की शक्ति मिलती है। अर्थात् उसमें सूक्ष्मतम शब्दों के सुनने की तथा सूक्ष्म वस्तुओं के ज्ञान की शक्ति आ जाती है।
उक्त कथित विधि से अट्ठारह लाख मंत्रजाप करने वाले साधक में देह की दिव्यता आ जाती है। वह भूमि से ऊपर उठकर इच्छानुसार आकाश में चक्कर लगा सकता है। वह भूमि-विवर का अवलोकन करने में भी सक्षम हो जाता है। आशय यह है कि वह पाताल-प्रवेश के मार्गों को देखने की क्षमता पा लेता है।
यदि प्रबुद्ध साधक उक्त मंत्र का अट्ठाइस लाख जप कर ले तो वह महाबली, कामदेव के समान रूपवान तथा विद्याधरों का अधिपति बन जाता है।
तीस लाख जप करने के पश्चात् वह सृष्टिकर्ता ब्रह्मा तथा पालनकर्ता विष्णु के समान हो जाता है। साठ लाख जप करने के बाद रुद्रत्व तथा अस्सी लाख जप करने पर वह सर्वभूतों का प्रियभाजन बनकर अमरता पा लेता है।
एक करोड़ का मंत्रजापक परमपद में विलीन हो जाया करता है। किन्तु इस प्रकार की साधना सम्पन्न करने वाले साधक तीनों भुवनों में बिरले ही हुआ करते हैं।
हे पार्वति! त्रिपुररूप शिव ही परम कारण है। उनका चरणारबिन्द क्षयरहित, शान्तिकारक, प्रमाणरहित तथा रोगरहित है।
उनकी प्राप्ति केवल योगियों के लिए सुलभ होती है। सभी मनोरथों की पूर्ति करने वाली शिवविद्या ही महाविद्या कही जाती है। हे महेश्वरि! यह अत्यन्त श्रेष्ठ और गोपनीय विद्या है।
शिवजी बोले - हे देवि! मेरे द्वारा कथित यह शास्त्र परम गोपनीय है। इसे विद्वान सदैव गुप्त ही रखते हैं।
सिद्धाभिलाषी साधकों के लिए यह परमावश्यक है कि वे इसे किसी के समक्ष प्रकट न करें। विद्या को गुप्त रखने से वह फलवती तथा प्रकटन से फलविहीन हो जाती है।
इस शास्त्र का नित्यप्रति आद्योपात्त पाठ करने वाले सुविज्ञ साधकों में शनैः शनैः योग की सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इस ग्रन्थ का नित्य पूजन करने वाला बुद्धिमान पुरुष अवश्य ही मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है।
इसके द्वारा सभी मोक्षार्थियों, सज्जनों, श्रवण करने वालों तथा क्रियाशील मनुष्यों को निश्चय ही सिद्धि मिलती है, किन्तु निश्वेष्ट और निष्क्रिय व्यक्ति के लिए किस प्रकार सम्भव हो सकता है?
विधिपूर्वक किये जाने वाले सत्कर्म से अभीप्सित फल की प्राप्ति सम्भव होती है। इसके अनुष्ठानकर्ता को कभी इन्द्रियासक्त नहीं होना चाहिए।
विषयासक्ति से दूर रहने वाला गृहस्थाश्रमी योगसाधन द्वारा विमुक्त हो जाता है। इसकी साधना गृहस्यों के लिए सिद्धिदायक होती है। अतः सभी गृहस्थाश्रमी को मंत्रजाप के सहित इसकी साधना निष्पन्न करनी चाहिए।
यदि स्त्री-पुत्रादि से युक्त गृहस्थाश्रमी संसर्ग का परित्यागकर भोगपथ में प्रवृत्त हो जाय तो उसमें भी सिद्धि के लक्षण भासित होने लगते तथा वह सदैव आनंदित रहकर क्रीड़ाशील रहा करता है। आशय यह है कि योगाभ्यासी को सर्वदा निःसंग रहकर जीवन-यापन करना उचित है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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