इस आज्ञापद्म के ध्यान में सदा ही रत रहने वाल प्रतिभाशाली साधक वासनारूपी महाबन्धन को तोड़कर आनंदविभोर रहा करते हैं। अर्थात् इसके निरन्तराभ्यास से वासना के बंधन का उन्मूलन हो जाता है।
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