मनोजयं च लभते वायुबिन्दुविधारणाम् ।
ऐहिकामुष्मिकी सिद्धिर्भवन्नैवात्र संशयः ।।
इसके परिणामस्वरूप वह पुरुष अपने चित्त को अधिकृत करके वायु और विन्दु (वीर्य) धारण में भी सक्षम बन जाता है। इसके अतिरिक्त उसे लौकिक सिद्धियाँ भी निःसंदेह रूप से उपलब्ध हो जाता है। आशय यह है कि आत्म-पूजक प्राणी अपने लौकिक एवं पारलौकिक-इन दोनों लोकों को सुधार लेता है। वह जब तक इस लोक में रहता है तब तक समस्त सुखों को भोगकर अन्य में निर्वाण पद को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार वह योगी 'एक तीर से दो निशाना' की कहावत भी चरितार्थ करता है।
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