निरन्तरकृताभ्यासाद्योगी विगतकल्मषः ।
सर्वदेहादि विस्मृत्य तदभिन्नः स्वयं गतः ।।
जो पुरुष इस प्रकार की साधना में सतत अभ्यासशील रहकर चित्त की विशुद्धता बनाये रखता है वह सभी देहादि कर्मों से पृथक् होकर आत्मस्वरूप को प्राप्त हो जाता है। अर्थात् वह अपने को आत्मा से अलग नहीं समझता।
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