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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 103
वायुः सञ्चरते देहे रसवृद्धिर्भवेद् ध्रुवम् । आकाशपङ्कजगलत्पीयूषमपि वर्द्धते ।।
उसके समूचे शरीर में स्वाभाविक गति से वायु का संचरण होने के फलस्वरूप उसमें रस का वर्धन होता है। तात्पर्य यह है कि उसका प्राणवायु सुषुम्ना में प्रवेशित हो जाता है। उसके सहस्रदल कमल से निरन्तर स्त्रवित होने वाले अमृत में भी वृद्धि होती है।
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