स्वदेहस्थ शिव-स्वरूप आत्मा का परित्याग कर बाह्य देवताओं का पूजन-अर्चन करना उसी प्रकार समझना चाहिए जिस प्रकार करस्थ पिण्ड को त्याग कर अन्य पिण्ड-प्राप्ति हेतु भ्रमण-शील रहना।
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