यः करोति सदाभ्यासं गुप्ताचारेण मानवः ।
स वै ब्रह्मविलीनः स्यात्पापकर्मरतो यदि ।।
यदि इसका अभ्यास गुप्तरूप से पापकर्म में लिप्त रहने वाला प्राणी भी नित्य करता रहे तो वह भी मोक्षद्वार तक पहुँच जाता है। हे प्राणवल्लभे! यह प्रतीकोपासना अभ्यासी के लिए निर्वाण पद दिलाने वाली होती है।
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