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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 27
अधिमात्रतरो ज्ञेयः सर्वयागस्य साधकः । त्रिभिस्संवत्सरैः सिद्धिरेतस्य नात्र संशयः । सर्वयोगाधिकारी स नात्र कार्या विचारणा ।।
इस प्रकार का योगाभ्यासी साधक ही अधिमात्रतम साधक कहा जाता है। ऐसे साधक को तीन वर्ष की साधना के पश्चात् सिद्धिप्राप्त होना सुनिश्चित रहता है। इस प्रकार के अभ्यासी समस्त योगसाधना हेतु उपयुक्त कहे जाते हैं।
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