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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 160
यदा पूर्णासु नाडीषु संनिरुद्धानिलास्तदा । बन्धत्यागेन कुण्डल्या मुखं रन्ध्राद्वहिर्भवेत् । सुषुम्णार्या सदैवायं वहेत्प्राणसमीरणः ।।
वायु के सन्निरोध होने से समस्त नाड़ियाँ उस वायु से परिपूर्ण हो उठती हैं। तदनन्तर कुंडलिनी शक्ति अपने बंधन को परित्याग कर ब्रह्मरन्ध्र के मुख को खुला छोड़कर बाहर निकल आती है। ऐसी अवस्था आने पर सुषुम्ना नाड़ी में सदैव ही अबाध गति से प्राणवायु का प्रवाह होने लगता है।
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