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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 130
त्रिकोणाकारतस्तस्याः सुधा क्षरति सन्ततम् । इडायाममृतं तत्र समं स्त्रवति चन्द्रमाः ।।
उस त्रिकोणाकार योनि द्वारा निरन्तर चन्द्रामृत का स्राव होता रहता है। उस चन्द्रमा से क्षरित होने वाला अमृत इड़ा नाड़ी द्वारा सदा ही धारारूप में गमनशील रहता है।
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