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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 143
अस्मिन् स्थाने मनो यस्य क्षणाई वर्ततेऽचलम् । तस्य सर्वाणि पापानि संक्षयं यान्ति तत्क्षणात् ।।
स्थिरचित्त से क्षणभर भी उस भयविनाशक आज्ञाचक्र के ध्यान में निमग्न हो जाय तो उसके समस्त पाप-पुंज उसी समय नाश को प्राप्त हो जाते है।
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