ऐसा योगीन्द्र विशुद्ध मन से उस शुद्धाचल के समान परमज्योतिपुंज के दर्शन पा लेता है। ऐसी दशा में योगसाधना के फलस्वरूप वह स्वयं ही उसका रक्षक बन जाता है। अर्थात् वह ज्योतिदर्शन के अभ्यास का सदैव ही अभिरक्षण किया करता है।
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