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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 191
निरन्तरकृते ध्याने जगद्विस्मरणं भवेत् । तदा विचित्रसामर्थ्यं योगिनो भवति ध्रुवम् ।।
उसमें जागतिक विषयों की विस्मृति तथा विचित्र प्रकार की क्षमता की उत्पत्ति हो जाती है। यह कथन बिलकुल ही सत्य है।
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