आत्म-दर्शन के पश्चात् हृदयाकाश में परमज्योति का प्रकाश फैल जाता है। यात्राकाल में, वैवाहिक काल में, मांगलिक कार्य के समय, संकटापत्र स्थिति में अथवा पाप के क्षयार्थ और पुण्य के वर्धनार्थ प्रतीकोपासना निश्चय ही श्रेयस्कर होता है।
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