यह सर्पाकर, कुंडलिनी शक्ति निद्रितावस्था में पड़ी रहती है। यह स्वयंप्रभा कहलाती है। अर्थात् अपने प्रकाश से ही प्रकाशमान रहकर सर्प के समान विवर में स्थित रहा करती है। यह वाग्देवी बीजसंज्ञक होती है।
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