ध्येयो ध्यानं तथा मन्त्रो दानं ख्यातिर्दिशासु च ।
वापीकूपतडागादिप्रासादारामकल्पना ।।
अपने ध्येय का ध्यान, मन्त्रोच्चारण में संलग्नता, दानादि कर्म करना, चारों ओर अपनी कीर्ति-पताका फहराना, बावली, कूप, तालाब तथा भवन निर्माण की कल्पना,
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